फिल्म समीक्षा: संगदिल

साहित्य का बड़े परदे पर अनुरूपण आज का नहीं, बहुत पुराना रिवाज़ है. पटकथा लेखक और स्क्रिप्ट लेखकों से पहले, पौराणिक कथाएं एवं उपन्यास ही फिल्मों को पटकथा प्रदान करते थे. हिंदी सिनेमा में ऐसे ही अनेक, देशी और विदेशी साहित्यों पर फिल्में बनी हैं.

सन 1952 की फिल्म ‘संगदिल’ ब्रिटिश लेखिका शार्लट ब्रोंटे के विख्यात उपन्यास ‘जेन आयर’ का रूपांतर है. इस फिल्म का निर्देशन आर. सी. तलवार ने किया था.

फिल्म में 1950 के दशक के सुप्रसिद्ध जोड़े, दिलीप कुमार और मधुबाला के साथ अभिनेत्री शम्मी, दारा सिंह और लीला चिटनीस मुख्य भूमिका निभाते दिखे.

संगदिल कहानी है दो दोस्तों की, जिन्हें बचपन में जुदा कर दिया जाता है. उनमें से एक को जोगन बना दिया जाता है और दूसरा हताश और बिगड़ैल ठाकुर बन जाता है. बिछड़ कर मिलना और फिर बिछड़ जाना इस फिल्म का अहम सार है.

इस फिल्म में ट्रेजेडी किंग कहे जाने वाले दिलीप कुमार अपने करियर का एक बेहद उम्दा किरदार निभाते दिखे

फिल्म में खासकर दो दृश्य बेहद खूबसूरती से फिल्माए गए हैं. एक सीन में दिलीप कुमार सरदार बन कर हास्यपूर्ण माहौल जमा कर दर्शकों को गुदगुदाते दिखे. वहीं दूसरे सीन में मधुबाला शिव आराधना करते मंत्रमुग्ध नृत्य करती दिखीं. 

1952 में मधुबाला संगदिल के आलावा साक़ी और देशभक्तन फिल्म में दिखीं थीं, और दिलीप कुमार फिल्म आन और दाग में दिखे थे. दोनों ही फिल्में सुपरहिट साबित हुईं थी और दाग के लिए दिलीप कुमार को फिल्मफेयर सर्वश्रेठे अभिनेता के अवार्ड से भी नवाज़ा गया था.

संगदिल का संगीत सज्जाद ने दिया और इसके गाने ये हवा ये रात ये चांदनी (तलत महमूद), दिल में समा गए साजन (तलत महमूद, लता मंगेशकर), ले चल वहां पिया जहां तेरा मेरा जिया (शमशाद बेगम) और धरती से दूर गोरे बादलों के पार (गीता दत्त, आशा भोंसले) मशहूर हुए थे.


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