फिल्म डॉक्यूमेंट्री दिलचस्प माध्यम है

एक फिल्म निर्देशक (film director) होने के साथ-साथ, सोमनाथ वाघमारे (Somnath Waghmare) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइन्सेज़ मुंबई में पीएचडी शोधकर्ता भी हैं. इनका मानना है कि मेनस्ट्रीम सिनेमा ने जब-जब दलित मुद्दे उठाए हैं, तब-तब फोकस केवल ज़ुल्मों और अत्याचारों पर किया गया है एवं एक दलित (dalit) की एकतरफा पीड़ित-सी छवि ही दर्शाई गई है. सोमनाथ अपनी फिल्मों के माध्यम से इस धारणा को चुनौती देते हैं और स्ट्रौंग आइडेंटिटी एज़र्शन की कहानियां सामने लाते हैं.

फिल्म निर्देशन में रूचि कैसे आई? आपने डॉक्युमेंट्री फिल्मों का माध्यम ही क्यों चुना?

मैं महाराष्ट्र (Maharashtra) के एक गांव में रहता हूं. काफी समय से मैं यहां की आंबेडकर विचारधारा एवं सम्बंधित आन्दोलन दलों से जुड़ा रहा हूं. कई साल पहले जब मैंने पुणे विश्विद्यालय में दाखिला लिया तो फ़िल्में भी मेरी पढ़ाई का हिस्सा बन गईं. फिर धीरे-धीरे फिल्म निर्देशन में दिलचस्पी बढ़ी. पर मेनस्ट्रीम सिनेमा में मैं अपने समुदाय की कहानियां नहीं देख पा रहा था. मैंने महसूस किया कि अपनी कहानियां सब तक पहुंचाने के लिए डॉक्यूमेंट्री (documentary) एक दिलचस्प माध्यम बन सकती है और अपने मुद्दों को उस सच्चाई और गंभीरता से सामने लाया जा सकता है जिसके वो लायक हैं.  

फिल्म निर्देशन से जुड़ी अपनी रिसर्च गतिविधि के बारे में बताएं.

किसी भी फिल्म को बनाने से पहले मैं उसके और उससे जुड़ी चीज़ों के बारे में गहराई से पढता हूं. कई लोगों से मिलता हूं —चाहे वे समाजसेवक हों या प्रोफ़ेसर. मैं उन लोगों से बातचीत ज़रूर करता हूं जो ग्राउंड लेवल पर काम करते हैं और मुद्दों को गहराई से समझते हैं. उससे मुझे काफी क्लैरिटी मिलती है.   

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सोमनाथ वाघमारे: हम जिस जाती में जन्म लेते हैं, उसकी धारणाएं, राजनीति और आक्रोश को अपने साथ लिए चलते हैं. कला और कलाकार को अलग-अलग देखना इसलिए मुश्किल है क्योंकि सबकी विचारधारा उनके बैकग्राउंड पर निर्भर है, जिसे उनसे अलग नहीं किया जा सकता.

अपनी फिल्म के विषय का चुनाव कैसे करते हैं? राजनीतिक दबाव, कौम को खतरा, पर्सनल अटैक्स जैसे कारकों की क्या भूमिका होती है?

जब मैं ‘भीमा कोरेगांव’ (The Battle of Bhima Koregaon: An Unending Journey) पर काम कर रहा था तब वह इतना चर्चित विषय नहीं था जितना बाद में बन गया. पर मैं इस बात से वाकिफ था कि यह एक रिस्की विषय है. कौन्ट्रॉवरशीयल मुद्दों (issues) पर काम करना एक फिल्म निर्देशक और उसके करीयर के लिए खतरनाक हो सकता है. ऐसे में मेरे लिए बहुत ज़रूरी था यह समझना कि मुझे लोग सपोर्ट करें. इसके साथ ही मैंने यह भी ध्यान रखा कि अपनी फिल्म को एक प्रोफेशनल प्लेटफार्म पर तो रखूं, पर उसे कमरश्यलाइज़ ना करूं. फिल्म तैयार होने के बाद भी कई विश्वविद्यालयों में हमें स्क्रीनिंग की इजाज़त नहीं मिली. जहां इजाज़त मिली भी, वहां अक्सर पुलिस की गाड़ियां आस-पास रहा करती थीं. तरह-तरह के कॉल भी आते थे. पर मुझे उस तरह की समस्याओं से नहीं गुज़रना पड़ा जिससे अक्सर फिल्म निर्देशकों को गुज़रना पड़ता है.

एक फिल्म-निर्देशक के लिए एक क्रिटिक होना कितना ज़रूरी है?

मुझे लगता है कि भारतीय समाज में यह मुमकिन ही नहीं है. हम जिस जाती में जन्म लेते हैं, उसकी धारणाएं, राजनीति और आक्रोश को अपने साथ लिए चलते हैं. कला और कलाकार को अलग-अलग देखना इसलिए मुश्किल है क्योंकि सबकी विचारधारा उनके बैकग्राउंड पर निर्भर है, जिसे उनसे अलग नहीं किया जा सकता. 

आपकी एक फिल्म 50 मिनट की है तो दूसरी केवल 5 मिनट की. एक फिल्म की टाइम ड्यूरेशन का उसकी पहुंच और सफलता में क्या योगदान होता है?

अपनी पहली फिल्म ‘आई एम नॉट अ विच’ (I Am Not a Witch) मैंने एक प्रतियोगिता के लिए बनाई थी, जहां हमे 15 मिनट का समय निर्धारित किया गया था. इसलिए वह फिल्म मैंने उतनी ही टाइम ड्यूरेशन की बनाई. अगर मैंने वह खुद के लिए बनाई होती तो वह और लम्बी होती. ‘भीमा कोरेगांव’ के समय मैं जानता था कि मुद्दे से जुड़े इतिहास और उससे सम्बंधित आलोचनाओं को फिल्म में शामिल करना बहुत ज़रूरी है. इस सब के लिए अगर मुझे दो घंटे लगते, तो मैं दो घंटे लगाता. मुझे लगता है कि अभी भी कुछ ख़ास दर्शक हैं जो मुद्दे में दिलचस्पी लेते हैं, फिल्म की लम्बाई में नहीं.

एक उभरते हुए कलाकार के लिए अच्छा या महंगा इक्विपमेंट कितना ज़रूरी है?

मेरा मानना है कि इक्विपमेंट से ज्यादा ज़रूरी है मुद्दा और फिल्म निर्देशन की समझ. सोच में क्लैरिटी ज़रूरी है, इक्विपमेंट की ज़रुरत सेकेंडरी है. 

एक उभरते हुए फिल्म निर्देशक के लिए आर्थिक मदद के क्या स्त्रोत हो सकते हैं?

मैं अपनी फिल्मों के लिए ज़्यादातर क्राउड-फंडिंग करता हूं. एक गाने के लिए मुझे ऍफ़.आई.सी.ए. से ग्रांट भी मिला था. मुझे लगता है उभरते हुए फिल्म निर्देशकों को एक असिसटेंट के तौर पर काम करना बहुत ज़रूरी है. इसके अलावा कुछ सरकारी ग्रांट्स हैं जिनके लिए अर्जी डाली जा सकती है.

भारत बोलेगा के पाठकों के लिए किन फिल्म या फिल्म निर्देशकों को रिकमेंड करेंगे?

भारतीय फिल्म-निर्देशक पा. रंजित और नागराज मंजुले, और इरानी फिल्म निर्देशक अब्बास कुरास्तोमी का काम मुझे पसंद है. कुछ बेहतरीन फिल्मों के उदाहरण हैं- कमट्टीपाडम, फैन्ड्री, सैराट, काला, पेरियारम पेरूमल, असुरन, तिथि, तिग्या.


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