फिल्म समीक्षा: बावर्ची

साल 1972 में आई बावर्ची हृषिकेश मुख़र्जी द्वारा निर्देशित फिल्म है. यह उस दौर की कहानी है जब हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार राजेश खन्ना का सितारा बुलंदी पर था.

हृषिकेश मुख़र्जी के साथ राजेश खन्ना ने काफी करुणात्मक फिल्मों में काम किया था, उन में से एक थी बावर्ची.

Bawarchi

राजेश खन्ना के साथ फिल्म में जया भादुरी, असरानी, ए. के. हंगल, दुर्गा खोटे और उषा किरण ने काम किया था. कथावाचक की भूमिका निभाई थी अमिताभ बच्चन ने, जिन्होंने हृषिकेश मुख़र्जी और राजेश खन्ना के साथ 1971 में फिल्म आनंद में काम किया था.

बावर्ची कहानी है शांति निवास और वहां रहने वाले अशांत सदस्यों की. घर के सभी जन आपस में दिन रात तू तू मैं मैं करते हैं, चाहे वह भाई हों या देवरानी जेठानी, और परेशान करते हैं बिन मां बाप की इकलौती बेटी कृष्णा (जया भादुरी) को.

परिवार की सबसे बड़ी समस्या है कि घर में कोई भी नौकर या बावर्ची कुछ दिन से ज़्यादा नहीं टिकता, हालांकि यह अलग बात है कि नौकर की अनुपस्थिति में घर का काम यदि कोई करता है तो वह है कृष्णा.

कहानी में मोड़ तब आता है जब शांति निवास में शांति लाने आता है रघु (राजेश खन्ना). यह बात अलग है कि रघु इतना भोला नहीं जितना कि वह जताता है.

अपने साथ वह कई राज़ लिए घूम रहा होता है. इन्हीं राज़ और प्लानिंग पर टिकी है ह्रिकेश मुख़र्जी की यह मार्मिक किंतु हास्यपूर्ण फिल्म, बावर्ची.

फिल्म में संगीत दिया है मदन मोहन ने और गीत लिखे हैं कैफ़ी आज़मी ने. ऋषिकेश दा के जादू और राजेश खन्ना के अभिनय ने बावर्ची को अमर बना दिया.

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