प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर खीरगंगा

कॉलेज के दोस्तों के साथ इस बार मैं खीरगंगा गया. अलग-अलग शहरों से आए हम पांच दोस्त दिल्ली से अपनी गाड़ी लेकर कुल्लू के रास्ते कसोल के लिए निकल पड़े. सुबह आठ बजे के निकले हम बारी-बारी से ड्राइव करते हुए शाम पांच बजे कसोल पहुंच गए. वहां हम कसोल कैंप नामक रिवर साइड कैंप में ठहरे.

कसोल में ऐसे कैंप की कमी नहीं हैं. एक हजार से लेकर दो हजार रूपये तक आरामदायक टेंट लिया जा सकता है. आप दो या चार लोगों के हिसाब से शेयरिंग टेंट्स भी ले सकते हैं. इन रंगबिरंगे टेंट्स में आपको कंबल और हीटर भी उपलब्ध कराया जाता है.

कसोल से थोड़ा आगे बढ़ें तो आपको अनेक सस्ते कैंप मिल जाएंगे. कैंपिंग की सबसे अच्छी बात होती है बॉनफायर, और यदि आप गाने गुनगुनाने या बजाने के शौकीन हों तो बॉनफायर का मजा अलग ही है. आसपास की दुकानें नौ बजे रात तक बंद हो जाती हैं इसलिए बॉनफायर का लुत्फ उठाने के लिए कुछ स्नैक्स एवं ड्रिंक्स पहले ही खरीद सकते हैं.

अगर कैंप में ना रुकना चाहें तो बजट होटल आपको आठ सौ रूपये से लेकर तीन हजार तक में मिल जाएंगे.

अगला दिन

रात भर आराम कर अगली सुबह हम गाड़ी से ही चार कि.मी. दूर मणिकरण की ओर बढ़े. वहां नैनादेवी मंदिर में दर्शन कर अनेक हॉट वाटर स्प्रिंग्स से गुजरते हुए हम गुरूद्वारे पहुंचे जहां लंगर में भोजन कर हमने गाड़ी वहीं पार्क कर दी व एक बजे वाली बस से बर्शैनी के लिए निकल पड़े.

बर्शैनी पहुंचने में हमें लगभग डेढ़ घंटे लगे. रास्ता खराब होने की वजह से यहां गाड़ी न ले जाने में ही समझदारी है. आखिरकार, पार्वती वैली पर स्थित हमारा खीरगंगा ट्रेक शुरू हुआ. यह ट्रेक बर्शैनी से दस कि.मी. लंबा है. चढाई के रास्ते में बीच-बीच में कई कैफे और होटल मिलते हैं लेकिन आधे रास्ते के बाद उनका दिखना कम हो जाता है.

ट्रेक पर लगभग हमेशा ही बर्फ होती है, इसलिए अच्छी ग्रिप वाले जूते और हाथ में एक छड़ी होना जरूरी होता है. ट्रेक के रास्ते का दृश्य बहुत ही सुंदर लगता है. ट्रेकिंग, कैंपिंग के दौरान अलग-अलग लोगों से मुलाकात का मौका मिलता है, जिससे सफर और भी खूबसूरत बन जाता है.

ट्रेक पर जाते समय रकसैक या कोई भी भारी सामान साथ ना रखें. सीढ़ीनुमा एवं लंबी चढाई की थकान से जेब में रखा एक रुमाल भी भारी लगने लगता है. रास्ते भर चूंकि पानी एवं चाय नाश्ते का इंतजाम होता है इसलिए उसे भी साथ ले जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. यदि फिर भी चाहें तो बिस्किट, चॉकलेट, ड्राई फ्रूट्स, ग्लूकोज पाउडर आदि अपने पास रख सकते हैं. ट्रेक के दौरान हाइड्रेटेड रहना अत्यंत आवश्यक है.


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हमारे ट्रेक का रास्ता लंबा था इसलिए थकान काफी हो रही थी. ऊपर पहुंचते-पहुंचते रात के नौ बज गए. वहां हमें आराम से रहने की जगह मिल गई. सौ रूपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से बहुत ही सस्ते में इंतजाम हो गया. हां, खाना महंगा जरूर लगा पर इतनी थकान के बाद एवं खाने का इंतजाम करने वाले लोगों की मेहनत को देखकर यह सौदा जायज लगता है.

इस पूरे ट्रेकिंग एवं कैंपिंग के दौरान हमें कई और ग्रुप मिले और शून्य से सात डिग्री नीचे के तापमान में भी हमने गर्मजोशी से सभी का अभिवादन किया. अगली सुबह बर्फ के बीच ही एक हॉट वाटर स्प्रिंग में स्नान कर हमने नीचे उतरने की तैयारी की. लेकिन, हमने जितना सोचा था उससे कहीं कठिन था नीचे उतरना. बर्फ के कारण पैरों को रोकना मुश्किल हो जाता है और फिसलने का खतरा बना रहता है. मौसम अगर खराब हो तो उतरने में ज्यादा समय भी लग सकता है. फिर, हम टैक्सी से वापस मणिकरण, और वहां से अपनी गाड़ी लेकर कसोल कैंप चल दिए.

वापसी में हमने मनाली, सोलांग वैली, पठानकोट एवं अमृतसर होते हुए दिल्ली का रास्ता पकड़ा जिस दौरान अनेक एडवेंचर स्पोर्ट्स का भी मजा लिया लेकिन ट्रेकिंग का अनुभव सबसे जादा यादगार बना.

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