क्यों ख़ास है वाराणसी

वाराणसी एक ऐसा शहर है जिसने संस्कृति, इतिहास और कला का क्रमिक विकास देखा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह संसदीय क्षेत्र इस बार फिर सुर्ख़ियों में है. वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री बनने के पूर्व भी नरेन्द्र मोदी कहते रहे हैं कि वाराणसी से उनका ख़ास रिश्ता है.

वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

नरेन्द्र मोदी ने अप्रैल 2014 में वाराणसी से अपना नामांकन दाखिल करते हुए इस प्राचीन नगर को भारत की गौरवशाली संस्कृति का उद्गम तथा परंपराओं, इतिहास, संस्कृति और समरसता का संगम स्थल कहा था.

गौरतलब है कि वाराणसी से मतदाताओं ने उन्हें रिकॉर्ड अंतर से विजयी बनाया, और इस वर्ष 2019 में पुनः नरेन्द्र मोदी वाराणसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं.

वाराणसी को विश्व विरासत स्थल कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. उत्कृष्ट पर्यटन स्थल तो यह शहर पहले से ही है. इसे अब दुनिया के समक्ष धरती के सर्वाधिक स्वच्छ, कनेक्टेड और संरक्षित स्थलों में एक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है.

प्रधानमंत्री बनने के पश्चात नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी की जनता को अपने एक संबोधन में कहा कि उनके पास वाराणसी के लिए कई योजनाएं हैं, जिन्हें वो जनता की ताकत यानी जनशक्ति के माध्यम से पूरा करना चाहेंगे.

वाराणसी स्थित सारनाथ में ही गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया था. वाराणसी पूजनीय संत रविदास की जन्मस्थली है.

“वाराणसी इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से भी पुराना है, किंवदंतियों से भी प्राचीन है और अगर इन सभी को एक साथ रख दिया जाए तो उनसे भी कहीं अधिक पुराना है.” ये वाराणसी के लिए मार्क ट्वेन के शब्द हैं.

वाराणसी संकट मोचन मंदिर की मंगल भूमि है. यह धरा दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करती है, जो यहां शांति और मोक्ष की तलाश में आते हैं.

वाराणसी स्थित सारनाथ में ही गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना प्रथम धर्मोपदेश दिया था. वाराणसी पूजनीय संत रविदास की जन्मस्थली है.

बनारस में ही महात्मा कबीर का भी जन्म हुआ, परवरिश हुई और यहीं से उन्होंने अपने ज्ञान का उजियारा दुनिया भर में फैलाया. मिर्जा ग़ालिब ने बनारस को ‘काबा-ए-हिन्दुस्तान’ और ‘चिराग-ए-दैर’ यानी दुनिया की रौशनी कहा था.

जब पंडित मदन मोहन मालवीय को शिक्षण केंद्र की स्थापना के लिए स्थान का चयन करना था, उन्होंने बनारस को ही चुना. गंगा-जमुनी तहज़ीब के महान दूत उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जिक्र किए बिना वाराणसी का परिचय अधूरा सा लगता है.

जब पंडित मदन मोहन मालवीय को शिक्षण केंद्र की स्थापना के लिए स्थान का चयन करना था, उन्होंने बनारस को ही चुना. गंगा-जमुनी तहज़ीब के महान दूत उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जिक्र किए बिना वाराणसी का परिचय अधूरा सा लगता है.

वाराणसी के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का प्यार अतुलनीय और अविस्मरणीय है. ज्ञात हो कि वर्ष 2001 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न से नवाज़ा गया.

सच में वाराणसी और यहां के लोगों में कुछ तो ख़ास है. इस देवभूमि का हर निवासी अपने अंदर कहीं न कहीं देवत्व लिए हुए है.

वाराणसी नगरी हजारों वर्षों से ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति का प्रतीक रही है. यह शिव की नगरी है. शिव जो विभिन्न संस्कृतियों के बीच समन्वय सेतु हैं. शिव जो संसार को बुराइयों से बचाने के लिए खुद विष पीकर नीलकंठ कहलाते हैं.

स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि “मैं चाहता हूं कि वाराणसी भारत की बौद्धिक राजधानी बने. हम काशी को ऐसे शहर के रूप में विकसित करना चाहेंगे जो भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र हो और जहां ज्ञान का निरंतर प्रवाह हो.”

वाराणसी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ जैसे विश्व-स्तरीय शिक्षा संस्थान हैं जिनके संवर्धन और सतत विकास की जरूरत है क्योंकि ये संस्थान न केवल बनारस की पहचान हैं बल्कि भोजपुरी क्षेत्रों सहित पूरे पूर्वांचल में ज्ञान की अलख जलाए रखने के लिए भी ये अपरिहार्य हैं.

यह माना जाता है कि ये वाराणसी ही है जहां गंगा मां का सौंदर्य और महत्व उस उच्चतम स्तर को प्राप्त कर लेता है जहां गंगा का दर्शन मात्र ही मुक्ति का माध्यम बन जाता है. पर आज यही मोक्षदायिनी गंगा स्वयं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.


भारत बोलेगा: जानकारी भी, समझदारी भी