राज कुमार के सामने स्क्रीन पर खड़े होना क्यों मुश्किल होता था

राज कुमार जिनके सफेद जूते और डायलॉग डिलीवरी आज तक दर्शकों के जेहन में जिंदा हैं, वे हिंदी सिनेमा में हमेशा अपने स्टाइल और तुनकमिज़ाजी के लिए जाने जाते रहे हैं.

राज कुमार के सभी डायलॉग सुपरहिट हैं, बॉलीवुड में अमर हैं. उनकी नक़ल करना भी मुश्किल है. आखिर वे खुद ही कह गए – हमको मिटा सके ज़माने में दम नहीं.

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वैसे तो बहुत से कलाकार आए जिन्होंने अपनी दमदार अदाकारी के बल पर पहचान बनाई, लेकिन राज कुमार का अंदाज़ ख़ास था.

राज कुमार के सामने स्क्रीन पर खड़े होना मामूली नहीं होता था. ऑफ-स्क्रीन भी लोगों को बेइज्ज़ती का सामना करना पड़ना था.

राज कुमार से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से सुनें बबलू शैलेन्द्र के इस पॉडकास्ट में. आप जान पाएंगे कि राज कुमार ने अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझा, और कहते हैं वे मुंहफट भी थे.

जो दिल में आता था, राज कुमार उसे शब्दों का बाण बनाकर सामने वाले पर दाग देते थे. ये बात तो सोचते भी नहीं थे कि सामने वाले को इसका बुरा लगेगा या नहीं. 

इस पॉडकास्ट में सुनें कुछ ऐसे किस्से जिनमें बताया गया है कि कब और कैसे राज कुमार ने अमिताभ बच्चन, ज़ीनत अमान, गोविंदा, प्रकाश मेहरा जैसे धुरंधरों को भी नहीं बक्शा.

राज कुमार का जन्म 1926 में बलूचिस्तान में हुआ था और गले के कैंसर के कारण 1996 में निधन हो गया. उनके संवाद ही अब उनकी याद हैं.   

बुलंदी फ़िल्म में आवाज़ के धनी राज कुमार ने बतौर प्रोफेसर सतीश ख़ुराना, कहा था – इरादा पैदा करो, इरादा. इरादे से आसमान का चांद भी इंसान के कदमों में सजदा करता है.

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राज कुमार की पाकीज़ा, काजल, दिल एक मंदिर, हमराज़, हीर रांझावक्त सदाबहार फिल्में हैं.

जानी… हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, पर बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वह वक्त भी हमारा होगा…

इस डायलॉग को सुनते ही आपके जेहन में राज कुमार के कई शानदार डायलॉग्स याद आ गए होंगे.

जी हां, इसलिए दर्शकों ने ही नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने भी उन्हें ‘राजकुमार’ माना और वे बने रहे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राज कुमार.


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