कैसे खड़ा किया कनपुरिया घड़ी ने डिटर्जेंट का एम्पायर

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मुरलीधर ज्ञानचंदानी- नाम तो सुना होगा. हो सकता है आप इस नाम से उतने परिचित न हों. लेकिन अगर कहा जाए कि घड़ी वाले ज्ञानचंदानी, तो आपके दिमाग में तुरंत एक लाइन कौंधेगी- पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें.

मुरलीधर ज्ञानचंदानी का घड़ी ब्रांड ही उनकी पहचान है. रोहित सर्फेक्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के मालिक ज्ञानचंदानी की कहानी सीमित पूंजी से काम शुरू करके, बिना बाजार से पूंजी लिए शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों की नींद उड़ाने वाली काराबोरी सफलता की कहानी है.

तीन दशक पहले बहुत छोटे स्तर से उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से डिटर्जेंट का काम शुरू करने वाले ज्ञानचंदानी बंधुओं की निजी संपत्ति, आज 12 हजार करोड़ रुपए से अधिक है.

मुरलीधर ज्ञानचंदानी का घड़ी ब्रांड ही उनकी पहचान है.

सस्ता डिटर्जेंट बनाने वाले ज्ञानचंदानी बंधु को अमेरिका की चर्चित आर्थिक मैगजीन फोर्ब्स ने देश के 100 सबसे अमीर लोगों में पचहत्तरवें स्थान पर रखा है.

उनके दफ्तर में लिखा मार्केट मंत्र ‘हर परिस्थिति में शांत रहने वाला शिखर को छू लेता है‘ उनके पूरे कारोबार की कामयाबी बयान कर देता है.

कैसे खड़ा हुआ साम्राज्य

घड़ी की कहानी शुरू होती है 1987 से. मुरलीधर ज्ञानचंदानी और उनके छोटे भाई विमल ज्ञानचंदानी ने मिलकर महादेव सोप्स प्राइवेट लिमिटेड के तले घड़ी डिटर्जेंट पाउडर लांच किया.

उस समय सस्ते डिटर्जेंट के बाजार पर निरमा का एकछत्र राज हुआ करता था. गुजरात के रहने वाले करसनभाई पटेल ने यूनिलीवर के उत्पाद सर्फ को मात देने के लिए अपना सस्ता डिटर्जेंट निरमा शुरू किया था.

दो दशक में ही निरमा के कब्जे में डिटर्जेंट मार्केट का 30 प्रतिशत हिस्सा था. हिंदुस्तान यूनिलीवर के कान खड़े हो गए. आखिरकार उसे 1988 में सस्ता डिटर्जेंट व्हील लेकर आना पड़ा.

निरमा और यूनिलीवर दोनों के पास बड़ी पूंजी थी और वे आपस में गलाकाट मुकाबले में उलझे हुए थे.

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निरमा के साथ जो प्रयोग करसनभाई ने किए थे, बहुत हद तक ज्ञानचंदानी ने वहीं प्रयोग घड़ी डिटर्जेंट के साथ उत्तर भारत, खासकर यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश के बाजार में किए.

यह काम इतनी कुशलता के साथ किया गया कि एक दिन ‘चेला’ अपने ‘गुरु’ से आगे निकल गया.

घड़ी ने सस्ते डिटर्जेंट की रेस में न सिर्फ निरमा को, बल्कि, निरमा को पछाड़ने वाले व्हील को भी पीछे छोड़ दिया. आज देश में बिकने वाला हर चौथा डिटर्जेंट घड़ी का है.

पूंजी नहीं पर हुनर भरपूर

घड़ी के सामने सबसे पहले अपनी अलग पहचान बनाने की चुनौती थी. तब डिटर्जेंट आमतौर पर नीले या पीले रंग के होते थे, ज्ञानचंदानी ने घड़ी को सफेद रखा.

उसे सफेदी के साथ जोड़ा और लोगों से अपील की कि एक बार उनके उत्पाद का इस्तेमाल करके तो देखें. घड़ी का सुपरहिट टैगलाइन है- ‘पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें’.

उत्तर भारत की बादशाहत

देश में नंबर वन बनने की घड़ी की कहानी से सीख लेकर आप भी कुछ नया कर सकते हैं. बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिए ज्ञानचंदानी ने एक अच्छी ऱणनीति बनाई.

निरमा और व्हील के बीच बाजार में दबदबा बनाने की जंग जहां पूरे देश के स्तर पर चल रही थी, ज्ञानचंदानी ने अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश पर पूरा फोकस किया.

यूपी सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य है इसलिए एक राज्य पर फोकस करके भी वह एक बड़े बाजार पर फोकस कर रहे थे.

उनका डिटर्जेंट क्वालिटी में किसी अन्य से कम नहीं था तो बस अब बारी थी विक्रेताओं को लुभाने की.

इसके लिए ज्ञानचंदानी ने दूसरी कंपनियों के मुकाबले 2 प्रतिशत कमीशन ज्यादा देना शुरू किया.

ज्यादा कमीशन देने से अपना नुकसान न हो, इसकी भरपाई के लिए उन्होंने हर 200-250 किलोमीटर पर एक छोटी यूनिट या फिर बड़ा डिपो बनाने की रणनीति अपनाई.

इससे फैक्ट्री या डिपो से सीधे माल डीलरों के पास और जल्दी मिल पहुंच जाता था. बीच के बहुत से खर्चों के साथ-साथ ट्रांसपोर्ट का खर्च भी कम हो गया.

मुरलीधर ज्ञानचंदानी का घड़ी ब्रांड ही उनकी पहचान है.

ज्ञानचंदानी और डीलर्स की चांदी

उत्तर प्रदेश के बाजार पर बादशाहत के बाद ज्ञानचंदानी ने बिहार और मध्य प्रदेश पर फोकस किया और उसी रणनीति से यहां के बाजार में अपना सिक्का जमा लिया.

उसके बाद घड़ी ने धीरे-धीरे करके उत्तर भारत के अन्य राज्यों के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के कम आय वाले और मध्यमवर्गीय परिवारों में भी अपनी मजबूत पैठ बना ली.

इसका नतीजा रहा कि 2012 में जारी हुए डिटर्जेंट कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी के आंकड़ों में घड़ी ने सस्ते डिटर्जेंट मार्केट में 17.4% हिस्सेदारी के साथ, अब तक इस सेगमेंट के बादशाह रहे व्हील को पीछे छोड़ दिया था. व्हील की हिस्सेदारी 16.9% थी. घड़ी की बादशाहत अभी बरकरार है.

डिटर्जेंट व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए 2005 में ज्ञानचंदानी परिवार ने डिटर्जेंट निर्माण से जुड़ी अपनी सभी कंपनियों का एकीकरण करके रोहित सर्फेक्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड (आरएसपीएल) की नींव रखी.


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आरएसपीएल घड़ी साबुन के अलावा बर्तन धोने वाले एक्सपर्ट डिशवॉश बार और एक्सपर्ट अल्ट्रा, यूनिवॉश डिटर्जेंट पाउडर और वीनस टॉयलेट सोप के अलावा प्रो-इज नाम से सेनिट्री पैड भी बनाती है.

ग्रुप ने डिटर्जेंट के अलावा फुटवेयर (रेड चीफ ब्रांड), रिअल एस्टेट और दूध उत्पाद (नमस्ते इंडिया) में भी कदम रखा लेकिन कंपनी की पहचान घड़ी से ही है.

अपनी स्थापना के 25 वर्षों बाद घड़ी ने जो सफलता हासिल की, उसे बनाए रखने के लिए लागत कम रखने के अपने मूलमंत्र के साथ यह आगे बढ़ रही है.

ट्रकों का काफिला बड़ा करने के साथ-साथ कंपनी ने अपनी फैक्ट्रियों का भी विस्तार किया. कंपनी के फिलहाल 20 बड़े कारखाने हैं.

घड़ी की सफलता इसलिए भी बड़ी हो जाती है क्योंकि आरएसपीएल कभी बाजार की पूंजी पर आश्रित नहीं रहा.

घड़ी वाले ज्ञानचंदानी

साथ ही, कंपनी विज्ञापन पर मात्र दो प्रतिशत खर्चती है. घड़ी अपने आप में इतना बड़ा ब्रांड है कि हाल तक कंपनी ने विज्ञापन के लिए किसी बड़े चेहरे को नहीं उतारा. अब अमिताभ बच्चन, विद्या बालन और कुछ अन्य बॉलीवुड कलाकार उसका विज्ञापन कर रहे हैं.

इससे पहले कंपनी ने उत्तर और पूर्व भारत के कुछ खास रूट पर स्पेशल रेलगाड़ियों के माध्यम से और छोटे शहरों में मैजिक शो आदि के माध्यम से प्रचार किया था. सफलता पूंजी की मोहताज नहीं होती. घड़ी की यात्रा इसकी मिसाल है.

घड़ी का ताज़ा स्लोगन

देश की मौजूदा स्थिति देखें तो जहां एक तरफ लॉकडाउन ने बिजनेस व जीवन ठप्प किया वहीं भारत-चीन सीमा पर तनाव बन गया – इस पर भी घड़ी ने अपना पंच दे दिया. देखें, किस तरह यह कंपनी लोगों का मूड भांप रही है और उन्हें वही दे रही है, जो वे चाहते हैं –

कुछ लोग वर्दी तो नहीं पहनते पर अपना फ़र्ज़ बखूबी निभाते हैं. ऐसे जांबाज़ ही तो दुकानदार कहलाते हैं. हमारे दुकानदार भाई जीवन का जोखिम उठाते हुए हमारी रोजमर्रा की जरूरत का सामान लगातार हम तक पहुंचाते रहे. तभी तो संकट के इस समय में भी देशवासी Lockdown का पालन कर पाए. हमारे दुकानदार भाई हैं हमारी शान, और इनसे ही है आत्मनिर्भर हिंदुस्तान.

इतना ही नहीं. प्रधानमंत्री की एक अपील पर भी घड़ी ने कैंपेन गढ़ दिया – क्वालिटी, प्रोडक्ट से पहले सोच में होनी चाहिए! #VocalForLocal

भारत बोलेगा: जानकारी भी, समझदारी भी

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