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सुख दुःख का संतुलन

प्रकृति में जितनी भी व्यवस्थाएं बनी हैं वे सभी प्रत्येक प्राणी के जीवन को सुचारू रूप से चलने के लिए बनी हैं. इसे समझने की कोशिश करें तो हम यह जान पाएंगे कि प्रकृति में सब कुछ कितना नियमित और सरल है – जैसे दिन और रात, जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख.

जीवन में हम जितने भी कार्य करते हैं वे सभी सुख की तैयारी के रूप में करते हैं, सुख के स्वागत के लिए करते हैं. हम अपने पूरे जीवन में एक बार भी दुःख के लिए कोई तैयारी नहीं करते जबकि हम ये जानते हैं कि प्रकृति के नियम के अनुसार हमारे जीवन में जितना स्थान सुख का है उतना ही स्थान दुःख का भी है.

लेकिन इस तैयारी से हम सदा बचते रहते हैं और बाहर की दुनिया में सुख की तलाश में दौड़-दौड़कर स्वयं को इतना कमजोर और लाचार कर लेते हैं कि दुःख की झलक मात्र से हम बिखर जाते हैं. इस बिखराव को हम जीवन भर के लिए संजो कर रख लेते हैं, हर क्षण उसे याद करते रहते हैं और जिस सुख की तैयारी में पूरा जीवन व्यर्थ गवां देते हैं उससे कुछ ही देर में ऊब जाते हैं.

जबकि अगर हम अपने इतिहास को देखें तो हम पाएंगे कि हमारे महापुरुषों ने अपने दुःख के स्वागत की तैयारी की और बाहर की दुनिया के क्षणिक सुख को छोड़ कर अपने अंदर के दुःख को सुख में परिपक्व किया. अतः हमें भी उनसे इस तरह की सीख लेकर जीवन में आए दुःख से सीखना चाहिए और उसे प्रकृति के संतुलन का नियम मान कर स्वीकार करना चाहिए.


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