क्यों डिफरेंट है हॉलीवुड

यौन शोषण के खिलाफ ‘मी टू’ मूवमेंट द्वारा कई दिग्गजों ने अपनी आवाज़ उठाई थी. सामाजिक कार्यकर्ता तरन बुर्के ने 2006 में इसका चलन शुरू किया था और हॉलीवुड की अभिनेत्री अलीसा मिलानो ने इसका इस्तेमाल ट्विटर पर कर सभी महिलाओं को उनके साथ हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने का साहस दिया.  

यह मूवमेंट विश्व भर में आग की तरह फैला और विख्यात पुरुष और महिलाओं से लेकर आम नागरिक तक, सब ने उनके साथ होने वाली यौन उत्पीड़न का ज़िक्र ट्वीट द्वारा किया. इनमें से कुछ प्रसिद्ध हस्तियां थीं- ग्वीनेथ पाल्त्रोव, एश्ले जुड्ड, जेनिफर लॉरेंस, टेरी क्रूज, रीस विदरस्पून, रोसारिओ डॉसन, वाइला डेविस, एना पाकिन, लेडी गागा, शेरिल क्रो, बजोर्क, सराह ह्यलंड, मौली रिंगवाल्ड, उमा थुरमन, मकैला मरने और एलेन डेजेनेरेस.

यौन उत्पीड़न के दोषियों में हॉलीवुड के कई बड़े नाम सामने आए थे जिनमें से कुछ थे, वुडी एलन, केविन स्पेसी और हार्वे वेंस्टीन. इस रहस्योद्घाटन से समस्त हॉलीवुड में सनसनी फ़ैल गई थी.

जब हॉलीवुड में फिल्मों और टेलिविज़न के अभिमुल्यन के लिए 75वें गोल्डन ग्लोब अवार्ड्स के समारोह की आयोजना हुई तो ‘मी टू’ मूवमेंट के सहयोग में, एकजुटता दिखाते हुए हॉलीवुड के लगभग सभी कलाकारों ने काले रंग के कपड़े पहनने का निर्णय लिया और यौन शोषण के खिलाफ एकात्मकता दिखाई.

कार्यक्रम की मेज़बानी कर रहे सेथ मेयर्स ने बिना किसी खौफ के यौन उत्पीड़न के दोषियों की धज्जियां उड़ाईं और दर्शकगणों ने उनका समर्थन किया. इस प्रकार, एक महत्वपूर्ण सबब के लिए हॉलीवुड एकजुट खड़ा हुआ और अवार्ड समारोह ने एक सामाजिक कार्य के समर्थन में अपनी बुलंद आवाज़ देकर अपने कार्यक्रम को एक उद्देश्य दिया.

हॉलीवुड में गोल्डन ग्लोब अवार्ड्स और अकादमी फिल्म अवार्ड्स यानी कि ऑस्कर अवार्ड्स को बहुत सम्मान दिया जाता है. इन अवार्ड समारोह के अतिथि या विजेता बनना, दोनों ही गौरव की बात हैं.

भारत की बात करें तो हमारे यहां स्टाइल, संगीत, फिल्म और टेलीविज़न, सभी के लिए अनेक अवार्ड हैं. कई बार ऐसा सुनने में भी आता है कि इन अवार्ड समारोहों में कभी-कभी कलाकार को इसलिए अवार्ड दे दिया जाता है कि वह कोई परफॉरमेंस करें, या सिर्फ इसलिए कि वह समारोह में आने की ज़ेहमत करें.

कंगना रनौत ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक बार उन्हें उनका पुरस्कार बस इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वह ट्रैफिक में फंसे रहने की वजह से वक़्त पर पहुंच नहीं पाईं थीं.

अवार्ड खरीदना इन भारतीय अवार्ड शोज की एक अन्य प्रथा है. हाल ही में यह खुलासा हुआ था कि अपनी पहली फिल्म बॉबी के लिए ऋषि कपूर ने पैसे देकर अवार्ड खरीदा था.

ऋषि कपूर का अभिनय निसंदेह बेहतरीन था किंतु यह अमिताभ बच्चन के ज़ंजीर व अभिमान और संजीव कुमार के अनामिका के निष्पादन से किस प्रकार बेहतर था यह तो वे शायद खुद भी नहीं बता सकते. इन्हीं सब कारणों की वजह से हिंदी फिल्म अवार्ड्स अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान खो चुके हैं.

हॉलीवुड के अवार्ड शो कला और कलाकार को सम्मान देने के लिए आयोजित होते हैं, किंतु यहां जो अवार्ड समारोह होते हैं वह इन कलाकारों की कला के प्रदर्शन के लिए होते हैं. 10 या 20 नाच गाने के बीच कुछ अवार्ड दे दिए जाते हैं, औपचारिकता के लिए.

यहां अवार्ड का महत्व नहीं है, महत्व है तो समारोह में होने वाले अनावश्यक उच्छृंखल तमाशे का, चाहे वह भव्य स्टेज हो, कलाकारों की ग्रैंड परफॉरमेंस से पहले उनकी नाटकीय एंट्री, या फिर उनके असंगत कॉस्टयूम एवं प्रॉप, या फिर यह कि किस कलाकार ने किस कलाकार को नज़रअंदाज़ किया, किस कलाकार ने कुछ ऐसा कहा कि विवाद हो सकता है, या फिर किस कलाकार ने किसी के अवार्ड लेते हुए या परफॉरमेंस के वक़्त आपत्तिजनक चेहरा बनाया. बस यही सब रह गया है बॉलीवुड के अवार्ड शो में.

अमिताभ स्टेज पर हों तो रेखा के भाव, बिना जोक के ठहाके लगाती हस्तियों के रेपेटेटिव शॉट्स, किसी कलाकार का फूलों से सजे रिक्शे पर एंट्री लेना तो किसी का हवा में आतिशबाजी के साथ परफार्मेंस के पहले पांच मिनट गंवाना, किन्हीं दो कलाकारों की मिलती जुलती ड्रेस पर कंट्रोवर्सी हो जाना, और किसी अदाकारा का वर्षों बाद स्टेज पर आना- एक ठेठ बॉलीवुड अवार्ड शो में अवार्ड के अलावा हर चीज़ पर फोकस किया जाता है.

कॉस्टयूम, स्टेज सेट-अप एवं परफॉरमेंस के वक़्त काम में लाए जाने वाले प्रॉप्स को देख कर यही प्रतीत होता है कि जितनी फ़िज़ूल खर्ची ये सब दिखावे के लिए की जाती है, इतने में इससे ज्यादा सहज और सुंदर 10 अवार्ड शो आयोजित किए जा सकते हैं. कई परफॉरमेंस को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि कलाकारों ने ठीक से रिहर्सल भी नहीं की है, बस बैकग्राउंड डांसर्स, आलीशान प्रॉप्स और भड़कीले कपड़े पहन कर स्टेज की शोभा बढाने पहुंच गए हों.

इन अवार्ड समारोह की बात करें तो यहां मेज़बान किसी अहम मुद्दे के लिए अपनी आवाज़ उठाते कभी नज़र नहीं आते, बल्कि अपने निजी जीवन की वाह वाही और इन अहम मुद्दों का मज़ाक उड़ाते नज़र आते हैं. पिछले साल एक अवार्ड समारोह में मेज़बानों ने बॉलीवुड में होने वाले स्वजन-पक्षपात के खिलाफ बोलने वाली कंगना रनौत का ही मज़ाक उड़ाया और इस तरह स्वजन-पक्षपात को और प्रबल किया.

हाल ही में अभिनेत्री कृति सेनॉन को एक अवार्ड से सम्मानित किया गया. अवार्ड का नाम था, ‘नथिंग टू हाईड’ यानी कि, छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है. अब यह अवार्ड सेरेमनी का मज़ाक उड़ाना नहीं है तो फिर क्या है? यह तो वही बात हुई ना, कि हम नहीं जानते कि आपको किसलिए अवार्ड मिलना चाहिए पर आप आएं हैं तो अवार्ड ज़रूर लेकर जाइए.

हैरानी की बात नहीं है कि काफी मशहूर हस्तियां जैसे- आमिर खान, सनी देओल, अजय देवगन और राम गोपाल वर्मा इन बॉलीवुड अवार्ड शो की घोर निंदा करते हैं.

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हमारे बॉलीवुड में हॉलीवुड से कम मसले हरगिज़ नहीं हैं. लेकिन, जब किसी सहकर्मी के साथ अन्याय होता है तो हॉलीवुड एकजुट खड़ा होता है और होने वाले अन्याय की घोर निंदा करता है. वह इन अवार्ड समारोह को एक स्टेटमेंट बनाने के लिए इस्तेमाल करता है और सफल भी होता है जबकि बॉलीवुड में एकात्मकता शायद है ही नहीं.

बॉलीवुड में बस करन जोहर और आदित्य चोपड़ा जैसे बड़े फिल्म मेकर का बोल बाला है. इनके खिलाफ कुछ भी बोलने से बोलने वाले का बहिष्कार कर दिया जाता है. किसी भी सहयोगी के साथ जब कुछ होता है तो उनके लिए आवाज़ उठाना तो दूर की बात है, पूछने पर भी अनसुना और देखने पर भी अनदेखा कर दिया जाता है.

हाल ही में फिल्म पद्मावत के इर्द गिर्द होने वाला विवाद इस बात का एक उदाहरण है जहां विवादों की राजनीति ने निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली और अभिनेत्री दीपिका पादुकोणे का अत्यधिक अपमान किया. हैरानी की बात नहीं है कि बॉलीवुड से किसी भी हस्ती ने इनके समर्थन में अपनी आवाज़ नहीं उठाई. अगर एक-एक करके अपनी आवाज़ उठाते तो शायद उनका हश्र भी वही होता.

अब वक़्त आ गया है कि बॉलीवुड एकात्मकता के बल की पहचान करे और इस प्रकार के अन्याय के प्रति अपनी आवाज़ उठाए.

बॉलीवुड को यह समझना होगा की क्रॉस-ड्रेसिंग या किसी का उसके लिंग, धर्म, रंग या काया आकृति पर मज़ाक उड़ाना हास्य मनोरंजन नहीं है. अनाव्यश्यक वादविवाद एक कार्यक्रम को सफल नहीं बनाते, जो सफल बनाता है, वह है उसके विचार या धारणा का मूल तत्व. 

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