मानसून में वायनाड की खूबसूरती

मेरे पति के ड्राइविंग के शौक और मेरे सैर-सपाटा करने और घूमने के जुनून ने हमें दुनिया के कई हसीन और नए-नए जगहों को जानने और देखने का मौका दिया है.

हमेशा दिल में यह हूक उठती रहती है कि चलो कहीं किसी नए जगह को तलाशा जाए, उसे नजदीक से जाना जाए. अपने एक जन्मदिन पर हमलोगों ने फैसला किया कि हम बेंगलुरु से वायनाड का सफर करेंगे और उसे एक्सप्लोर करेंगे.

वीकएंड था और फटाफट सारे जरुरी सामान पैक कर हम निकल पड़े ईश्वर के अपने देश – वायनाड की खोज में. जैसा हमने सुन रखा था कि मानसून में वायनाड की जवानी उफान पर रहती है, सच में नजारा वैसा ही था.

वायानाड के नाम के पीछे भी एक कहानी है जो इसके खूबसूरती में छिपी है. वायानाड दो शब्दों से मिल कर बना है. ‘वायाल’ और ‘नाद’.

चारो तरफ हरे-भरे खेत, सैकड़ों एकड़ में फैले नारियल और केले के बागान. दूर तक फैले सूर्यमुखी के खेत.

वायनाड पहुंचकर ऐसा लग रहा था मानों हम किसी जन्नत में आ गए हों

वायनाड के नाम के पीछे भी एक कहानी है जो इसकी खूबसूरती में छिपी है. वायनाड दो शब्दों से मिल कर बना है. ‘वायाल’ और ‘नाद’.

‘वायाल’ मतलब धान और ‘नाद’ मतलब खेत. यानी धान के खेत. नाम से ही इस जगह की कुदरती खूबसूरती का अंदाज लगाया जा सकता है.

वायनाड दक्षिण भारत के राज्य केरल का एक जिला है. जिले का हेडक्वार्टर कालपेट्टा है जो एक सुंदर शहर है. वायनाड वेस्टर्न घाट में 700 से 2100 मीटर की उंचाई पर स्थित है.

रास्ते में हमलोगों ने बांदीपुर वन अभ्यारण्य भी देखा. यहां का नजारा तो और अदभुत था. हरी-भरी जंगली घास पर चर रहे हिरणों के झुंड ने मन मोह लिया. हमने हिरणों के साथ कई सेल्फी भी ली.

वहां से कालपेट्टा शहर पहुंचने में छह घंटे लगे. यहां हमारे पति ने ठहरने के लिए पहचान के ही एक साथी से हरियाली के बीचो-बीच एक फार्म हाउस बुक कराया था.

मानसून की बारिश से यहां चारो और फैली हरियाली से एक अजब ही ताजगी महसूस हो रही थी. लेकिन बगल के रेस्टोरेंट से हमलोग जब लंच लेकर आए तो नींद आंखों में उतर रही थी.

शहर घूमने की चाहत थी और हम उसी आलस्य और सुस्ती में निकल पड़े शहर की सैर में. कॉफी के खेत, धुंध में लिपटी झील और खुशनुमा मौसम से मन आह्लादित हो उठा.

रात में मेहमानवाजी करने का मौका मिला. हमारे मेजबान ने रात के डिनर में लजीज चिकन करी और चपाती पका के रखा हुआ था हमलोगों के आतिथ्य में.

रात में शहर का तापमान काफी नीचे गिर गया था और हमलोग नींद की आगोश में चले गए. सुबह जब हमलोग फ्रेश होकर निकले तो बाहर केरल का पारंपरिक लजीज नाश्ता हमलोगों का इंतजार कर रहा था – पुट्टु और कडाला करी, जिसमें पका हुआ चावल, नारियल के पकौड़े और चना करी शामिल था.

नाश्ते के बाद बाजार घूमने निकले जहां हमलोगों ने केरल के मशहूर मसाले और मिट्टी के कई बर्तन और कलात्मक घड़े खरीदे, और फिर वहां से वापस बेंगलुरु.

मन में अभी भी कसक है कि एक बार फिर से वायनाड जाएंगे और धुंध से आच्छादित पर्वतों और झीलों के बीच मौज-मस्ती करेंगे.

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