फाल्ट इन आवर स्टार्स

‘द फाल्ट इन आवर स्टार्स’ फिल्म ख़त्म होने पर आप पलकें नहीं झपकाते. ना ही एक लंबी सांस छोड़ते हैं. बस किरदार के हो कर रह जाते हैं. खास कर उस किरदार के जिसके शॉट से फिल्म ख़त्म होती है.

हेज़ल ग्रेस पूरी फिल्म में अपनी नाक के दोनों छेदों में प्लास्टिक की पाइप पहने होती हैं. और जब फिल्म ख़त्म होती है वह घास पर लेटे दिखती हैं. लगता है मानों, तब आपने भी उनके साथ वो पाइप पहन ली हो.

फिल्मों में पहले भी भयानक रोगों से लड़ते हुए किरदारों को दिखाया गया है. फिल्म, कथा और किरदार की तारीफें तब भी हुई है.

‘आनंद’ में राजेश खन्ना मर कर भी अमर हो जाते हैं. ‘कल हो न हो’ में शाहरुख़ खान त्याग के देवता बनाये गए हैं. ‘दर्द का रिश्ता’ में कैंसर से लड़ाई दिखाई जाती है.

लेकिन ‘द फाल्ट इन आवर स्टार्स’ ने जिस अंदाज़ में एक कहानी पेश की है, वह दिल के करीब अपनी जानी पहचानी सी लगती है.

इसलिए भी कि, एक तरफ अगर लोग कैंसर से लड़ कर विजेता बन रहे हैं तो दूसरी तरफ उचित इलाज के बावजूद हमारे परिजन समय से पहले दुनिया छोड़ कर अचानक चले भी जा रहे हैं.

हेज़ल ग्रेस कैंसर पीड़ित है और मजबूरन पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलिंडर हमेशा साथ लेकर चलने को विवश है. फिल्म में कहीं भी उटपटांग तरीके से डाक्टरों-हस्पतालों की भाग-दौड़ नहीं है. ना ही हेज़ल को त्याग का मसीहा बनाया गया है.

एक कैंसर मरीजों के सहायता समूह में हेज़ल को ऑगस्टस वाटर्स नाम का साथी मिलता है जो खुद भी कैंसर से जूझ रहा है. ऑगस्टस को अपना एक पैर भी कटवाना पड़ा है. लेकिन उसके दर्द को भी स्क्रीन पर नहीं दिखाया गया है. शायद यहीं फिल्म स्कोर करती है.

एक दूसरे की पसंदीदा उपन्यासों को पढ़ने के लिए दोनों के सहमत होते ही फिल्म दिलचस्प मोड़ लेती है. हेज़ल और ऑगस्टस एम्सटर्डम पहुँच जाते हैं, जहाँ उनका रोमांस और रोमांच फिल्म को मजबूती देता है.

फिल्म में एकदम साधारण अंग्रेजी का प्रयोग है, भीनी-भीनी संगीत की छौंक लगातार लगती रहती है और एक-एक डायलाग सुनने और समझने वाले हैं.

कोई ज्ञान नहीं बांटा गया है फिर भी इतनी सादगी और सहजता से ज़िन्दगी की नसीहत दी गई है कि पूछिए मत.

स्थिति कहीं भी निराशाजनक या होपलेस नहीं दिखाई गई है. सबसे कमाल तो यह है कि दोनों ही मुख्य किरदार टीन-एजर हैं. कैसे मुस्कुराते हुए, हंसते गाते वे कैंसर से लड़ते हैं, कोई इनसे सीखे.

कुछ-एक रोमांटिक चुंबन फिल्म की जरूरत है अन्यथा इस रोमांटिक फिल्म में सेक्स कहीं नहीं दिखाया गया है. युवा जोड़े आकर्षित करते हैं और उनके पहनावे और आर्ट डायरेक्शन में गज़ब की सादगी दिखाई गई है.

फिल्म में एक सुंदर लड़का है, एक सुन्दर लड़की है, एक सुन्दर कहानी है. संगीत भी सुन्दर है और अभिनय तो सातवें आसमान पर है. एकदम नेचुरल.

ज़िन्दगी से लड़ते हुए भी आपको प्यार चाहिए, यह बखूबी दर्शाया गया है. प्यार की पहचान करना और उसे सहजता से जीना-और-निभाना ‘द फाल्ट इन आवर स्टार्स’ की सबसे बड़ी विशेषता है.

कोई लड़ाई हमें कमजोर नहीं करती, चाहे वह ज़िन्दगी के साथ चुनौती भरी जंग क्यूँ न हो. शान से जीना, प्यार करते रहना, जब तक जीना अपने अंदाज़ में जीना, अपने साथी के लिए सम्मान होना – ये सारे सन्देश इस फिल्म की पहचान हैं.

डिप्रेशन से कैसे लड़ा जाए, ट्रेजेडी से कैसा बाहर आया जाए, ज़िन्दगी कैसे जी जाए – इसके टिप्स भी मनोरंजन के माध्यम से डायरेक्टर ने हमें पास-आन किया है.

अपने अंतिम दिनों को भांप कर ऑगस्टस जिस तरह से खुद के लिए एक पूर्व अंतिम संस्कार की व्यवस्था करता है, और जिस तरह हेज़ल इस घटना को स्वीकारती है, वह लाजवाब है.

कहते हैं पुस्तक से प्रेरित हो कर फिल्में नहीं बनाई जा सकती. लेकिन ‘द फाल्ट इन आवर स्टार्स’ इस मापदंड पर भी खरी उतरती है. ट्रेजेडी के ढेर पर ऐसी रोमांटिक फिल्म बन सकती है, यह अहसास सुखद है, खासकर फिल्म प्रेमियों के लिए.

‘टाइटैनिक’ फिल्म भी एक ट्रेजेडी थी. और उसी ट्रेजेडी को खूबसूरत अंदाज़ में पेश कर एक जबरदस्त कहानी तैयार की गई थी. फिर क्या हुआ, सब जानते हैं.

‘द फाल्ट इन आवर स्टार्स’ में कैंसर रोग भी टाइटैनिक जहाज की तरह है, जिस पर दो अत्यंत खूबसूरत जोड़े सवार हैं. फिल्म में क्या होता है, जानने के लिए आपको फिल्म देखना होगा.

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