मार्च एक बार फिर लौट आया है. साथ में नवीनीकरण का वही घिसा-पिटा वादा भी है. वसंत हमें याद दिलाने आता है कि जीवन हर हाल में अपना रास्ता बना ही लेता है. लेकिन इस साल का यह ताज़ा मार्च कुछ अधिक भारी और बोझिल महसूस हो रहा है—इसलिए नहीं कि दुनिया में हिंसा बढ़ गई है, बल्कि इसलिए क्योंकि अब हिंसा का बचाव एक भयावह आत्मविश्वास के साथ किया जा रहा है.
आप खुद देखें कि आज कैसे कुछ ताकतें केवल सत्ता का उपभोग नहीं कर रहीं, बल्कि वे क्रूरता को ‘सरकारी नीति’ बनाकर उसे सही ठहराने पर आमादा हैं.
जब मैं बेंजामिन नेतन्याहू के तर्कों को सुनती हूं, तो वहां मुझे सुरक्षा की चिंता कम, नैतिक मर्यादाओं का पतन ज्यादा दिखाई देता है. वहां मासूमों की मौत को जायज ठहराया जाता है, इंसानी बस्तियों को केवल रणनीतिक बाधा माना जाता है और अंतरात्मा को क्षेत्रीय जुनून और ज़मीन के लालच के आगे गिरवी रख दिया जाता है. वहीं डोनाल्ड ट्रंप की बातों में मुझे जिम्मेदारी वाला नेतृत्व नहीं, बल्कि नैतिकता के बोझ से मुक्त वह अहंकार सुनाई देता है जहां सिर्फ ताकत की पूजा होती है, संवेदना का मजाक उड़ता है और हिंसा का स्वागत तब तक किया जाता है जब तक वह वर्चस्व व प्रभुत्व की सेवा करती रहे.
इतिहास को ऐसी सियासत का असली चेहरा पहचानने में कोई उलझन नहीं होगी.
सत्ता का अहंकार बनाम प्रतिरोध की आध्यात्मिक शक्ति
इसी वैचारिक बंटवारे के दूसरी तरफ ईरान खड़ा है—जिसे अक्सर शक की निगाहों से देखा जाता है और एक सनकी या खतरनाक मुल्क के तौर पर पेश किया जाता है. लेकिन उसकी ‘नैतिक कल्पना’ (moral imagination) को सिरे से खारिज कर देना दरअसल एक गहरी सभ्यतागत विरासत को न समझ पाना है. आयतुल्ला अली खामेनेई की विरासत सिर्फ सियासी नहीं है; यह उस रूहानी और अख्लाकी समझ में रची-बसी है जिसे शिया पंथ में ‘प्रतिरोध’ कहा जाता है. इस परंपरा में शहादत मौत की कोई प्यास नहीं है, बल्कि यह अन्याय को स्वीकार करने या वैधता देने से स्पष्ट इनकार है.

एक शिया मुसलमान के लिए शहादत की सबसे बड़ी मिसाल हिंसा नहीं, बल्कि इमाम हुसैन हैं—जो कर्बला के मैदान में जुल्म के सामने इस यकीन के साथ डटे रहे कि वे मार दिए जाएंगे. उन्होंने नैतिक हार या नैतिक आत्मसमर्पण के बजाय जिस्मानी हार को चुना. खामेनेई का शहादत का दर्शन इसी विरासत से निकला है: जहां कष्ट इसलिए सहे जाते हैं ताकि जुल्म का चेहरा बेनकाब हो सके.
आज की आधुनिक दुनिया जानबूझकर उस फर्क को नहीं देखना चाहती जो बिल्कुल साफ है.
एक मौत वह है जो अपनी सत्ता बचाने के लिए दूसरों पर थोपी जाती है. दूसरी मौत वह है जिसे सत्ता की वैधता छीनने के लिए गले लगाया जाता है. इन दोनों को एक ही तराजू में तौलना न केवल वैचारिक आलस्य है, बल्कि यह एक तरह की नैतिक बुज़दिली भी है.
मुझे हैरत होती है कि कैसे पश्चिम आज बड़ी बेशर्मी से ‘ज़रूरी हिंसा’ (necessary violence) की पैरवी करता है, लेकिन प्रतिरोध के उस आध्यात्मिक साहस का मजाक उड़ाता है. जब कोई ताकतवर मुल्क बम बरसाता है, तो उसे ‘आत्मरक्षा’ कहा जाता है. जब उसकी सेनाएं कत्लेआम करती हैं, तो उसे ‘कोलेटरल डैमेज’ का नाम देकर फाइल बंद कर दी जाती है. लेकिन वही बलिदान जो झुकने से मना कर दे, उसे ‘कट्टरपंथ’ करार दिया जाता है.
यह निष्पक्षता नहीं है. यह चयनात्मक नैतिकता है.
हमें बार-बार बताया जाता है कि इज़राइल को अपनी रक्षा का हक है—लेकिन कभी यह नहीं पूछा जाता कि क्या रक्षा के नाम पर पूरी नस्ल को मिटाया जा सकता है? हमें यकीन दिलाया जाता है कि अमेरिका दुनिया में स्थिरता के लिए काम करता है—लेकिन उस ‘स्थिरता’ ने कितनी लाशें बिछाईं, उसका हिसाब कभी नहीं मांगा जाता. इस बीच, जो शहादत और कुर्बानी की बात करते हैं, उन्हें पिछड़ा और जाहिल समझा जाता है, भले ही उनका नैतिक पैमाना सत्ता की गुलामी के बजाय उससे जवाबदेही मांगता हो.
हिंसा की ताकतवर वर्दी
इस मार्च ने मुझे एक कड़वे सच के सामने खड़ा कर दिया है: हिंसा अब सिर्फ सामान्य नहीं रही, बल्कि वह अब ‘इज्जतदार’ बन गई है—शर्त बस इतनी है कि वह हिंसा किसी ताकतवर की वर्दी पहनकर की जाए.
वह कैसी सभ्यता है जो मासूम बच्चों की मौत को राजनीतिक तर्कों (talking points) से सही ठहराती है?
वह कैसा संसार है जो हमें सिखाता है कि ज़मीन की सरहदें इंसानी जान से ज्यादा कीमती हैं?
वह कैसी नैतिक व्यवस्था है जो विनाश का आदेश देने वालों को नायक मानती है, लेकिन उन लोगों को तुच्छ समझती है जो झुकने के बजाय मिट जाना पसंद करते हैं?
यह धर्मों की लड़ाई नहीं है. यह नैतिकता का बुनियादी टकराव है.
एक तरफ वे हुक्मरान हैं जो मानते हैं कि अमन सिर्फ खौफ और बमों के दम पर कायम हो सकता है और ताकतवर के लिए कोई कानून नहीं होता. दूसरी तरफ वह रिवायत है जो कहती है कि अन्याय को उसकी आंखों में आंखें डालकर ‘अन्याय’ कहना ही होगा—भले ही उसकी कीमत खून से चुकानी पड़े.
मैं जानती हूं कि मेरी जगह कहां है.
इतिहास ताकत को कभी सम्मान से याद नहीं रखता. वह केवल साहस, संयम और वैचारिक स्पष्टता को सहेजता है. तानाशाह अपने दौर में अक्सर बहुत तार्किक और ‘प्रैक्टिकल’ लगते हैं, और शहीदों को अक्सर तब तक नहीं समझा जाता जब तक बहुत देर न हो जाए.
मार्च बीत जाएगा. औपचारिक बयान दिए जाएंगे. युद्धों की नई व्याख्याएं होंगी. लेकिन इंसानियत का नैतिक हिसाब-किताब अभी लिखा जा रहा है.
और जब आने वाली नस्लें पूछेंगी कि किसने हिंसा की वकालत की और किसने उसका सीना तानकर विरोध किया—किसने दुख को आंकड़ों में बदला और किसने उसे जायज ठहराने से इनकार किया—तब मुझे उम्मीद है कि हम जानते होंगे कि इतिहास के इस मोड़ पर हमने किस तरफ खड़े होने का फैसला किया था.
ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ी लेखनी