फिल्म समीक्षा: सत्यम, शिवम्, सुन्दरम

आंख जो देखे धोखा खाए, दिल जो अंधा वो ही राह बताए – शायद जीवन का सबसे सुंदर सत्य यही है. हम बात कर रहे हैं एक ऐसी फिल्म कि जो शायद ही किसी दर्शक ने पसंद ना की हो.

जैनेन्द्र जैन द्वारा लिखित 1978 में प्रदर्शित सत्यम,शिवम्, सुन्दरम एक बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश को दर्शाती है – ईश्वर ही सत्य है, और सत्य ही सबसे सुंदर है.

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राज कपूर द्वारा निर्देशित यह सिनेमा एक प्रेम कथा के ज़रिये हर उस सामाजिक कुरीति की बात करता है जो  हम आज भी देख सकते हैं.

शहरी नागरिक का ग्रामीण परिवेश को नीचा देखना, बाहरी सुंदरता को आंतरिक सुंदरता से ज्यादा महत्व देना उनमें से कुछ अहम रूढ़िवादी सोच हैं.

ज़ीनत अमान, शशि कपूर, ए.के. हंगल, पद्मिनी कोल्हापुरे अभिनीत यह सिनेमा कहानी है रूपा की जो ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी धार्मिक लड़की है, जो अपने आप को प्रभु की भक्ति में लीन रखती है.

बचपन में चेहरे के एक हिस्से पर तेल गिरने के कारण रूपा का चेहरा जला हुआ है. वहीं राजीव शहरी परिवेश में पला बढ़ा इंजीनियर है जो गांव में नदी पर बांध बनाने आया है.

राजीव को सुंदरता और तरक्की बेहद अच्छी लगती है. एक दिन राजीव रूपा की मधुर आवाज़ में भजन सुनता है और उसकी आवाज़ का दीवाना हो जाता है.

राजीव अभी रूपा के अतीत से परिचित नहीं होता. राधु कर्माकर के छायांकन से संजोये हुए इस सिनेमा में मोड़ तब आता है जब शादी के बाद राजीव को रूपा के चेहरे के निशान के बारे में पता चलता है और वह अपने आप को छला हुआ महसूस करता है.

अपनी पत्नी से दूर वो रात को एक गैर औरत से प्यार करने लगता है, जो खुद रूपा ही होती है. यशोमति मैया से बोले नंदलाला, सत्यम शिवम् सुन्दरम जैसे सदाबहार गानों को संगीत दिया है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने और सुरों से पिरोया है मन्ना डे और लाता मंगेशकर की आवाज़ ने.

राजीव क्या रूपा को स्वीकार कर पाएगा? क्या वह रूपा की आंतरिक सुंदरता को देख पाएगा? जानने के लिए जरूर देखिएगा, सत्यम शिवम् सुन्दरम.

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