फिल्म समीक्षा: कथा

बचपन से ही हम कछुए और खरगोश की कहानी सुनते आ रहे हैं जिसका सबक है कि सहजता और स्थिरता से दौड़ जीती जाती है. इसी लघु कहानी का आधुनिक पदार्पण राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता सई परांजपे द्वारा निर्देशित सन 1983 की फिल्म ‘कथा’ में दिखता है.

इस फिल्म में मुख्य किरदार निभाए हैं दीप्ति नवल, फारूख शेख, नसीरुद्दीन शाह और मल्लिका साराभाई ने. 

कहानी है गांव से आए मुंबई के एक चॉल में रहने वाले राजाराम जोशी की जो अपने चॉल में हर किसी के दुःख सुख में मदद करते हैं. राजाराम बड़ी शिद्दत से अपनी पड़ोसन संध्या सबनीस को चाहते हैं जो उन्हें राजाराम जी बुलाती हैं.

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कहानी में मोड़ तब आता है जब कहानी का खरगोश यानी राजाराम का पुराना दोस्त बासुदेव इंट्री मारता है. बासुदेव अपनी चुपड़ी बातों और झूठ मक्कारी से राजाराम के सभी चाहने वालों को अपने वश में कर लेता है और राजाराम देखता रह जाता है.

बासुदेव एक साथ तीन अलग-अलग औरतों के साथ प्रेम प्रसंग के फूल खिलाता है और इसे बहुत ही बेहतरीन ढंग से फिल्म के एक गाने ‘तुम सुंदर हो’ में दर्शाया गया है. 

इस फिल्म से पहले तक फारुख शेख सामान्यतः सीधे और साधारण आदमी के किरदार निभाते आए थे और कथा में उन्हें चतुर और शातिर फ्लर्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया जिस भूमिका में उन्होंने अपने व्यक्तित्व के आकर्षण को बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया.

फिल्म का मूल है कि धीमेपन और स्थिरता से दौड़ जीती तो जाती है, पर क्या इंतज़ार करते रहना सच में लाभदायक है?

आपको यह जान कर हैरानी होगी कि फिल्म के नकारात्मक किरदार बासुदेव का नाम निर्देशक साईं ने फिल्म निर्माता बासु भट्ट पर लिखा था जिनके साथ फिल्म स्पर्श के दौरान उनकी खटपट हो गई थी.

मल्लिका साराभाई को अमीर, आकर्षक और वक्त पड़ने पर फ्लर्ट का सहारा लेने वाली अनुराधा की भूमिका देकर सई परांजपे ने इस छोटी सी भूमिका को महत्वपूर्ण बना दिया.

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