बिहार में किसकी लहर

बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में 28 साल बाद कांग्रेस ने रैली कर प्रदेश की जनता को अपना संदेश दे दिया है.

यह एक साहसी कदम था जिसके लिए बिहार कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व बधाई का पात्र है. लेकिन, सवाल कई हैं.

सर्वप्रथम, कांग्रेस के पास कोई बेहतरीन वक्ता नहीं है जो भीड़ को अपने दम पर आकर्षित कर सके.

यह विचार करने योग्य है कि कांग्रेस की संस्कृति ऐसे किसी वक्ता या विचारक को पनपने देने की नहीं रही है.

  • कांग्रेस की 28 साल बाद पटना के गांधी मैदान में रैली
  • इससे पहले 1989 में राजीव गांधी पटना आए थे
  • कांग्रेस की जन आकांक्षा रैली में राजद समेत अन्य पार्टियों के नेता जुटे
  • इस रैली में मंच से राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जमकर आलोचना की

ज्ञात है कि बिहार की भूमि शांति की भूमि रही है. पर जरूरत आ पड़ने पर ये क्रांति की भी भूमि है. गांधी मैदान से, जो बदलाव की आवाज़ लगाई गई उससे कांग्रेस पार्टी कितनी बलवान होती है, यह देखना होगा. अगर उम्मीद उठी है तो उसे कार्यकर्ताओं की मदद से और मज़बूत बनाना होगा.

Rahul Gandhi in Patna Gandhi Maidan Bihar Rally on February 3, 2019

कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को क्या सोचना चाहिए

फिलहाल कांग्रेस को क्षेत्रीय क्षत्रप तैयार करने होंगे, जिनकी जमीनी पकड़ मजबूत हो.

दो उदाहरण दिया जा सकता है. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ राज शेखर रेड्डी की जमीनी लड़ाई. दूसरा उदाहरण हाल में ही छतीसगढ़ में भूपेश बघेल की लड़ाई और जबरदस्त विजय.

युवा नेतृत्व, युवा कमान

कांग्रेस के पास बेहतरीन दिमाग हो सकता है लेकिन क्या कोई बताएगा कि युवाओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां क्यों नहीं दी जा रही हैं?

पटना के सबसे बड़े मैदान में 3 फ़रवरी की रैली में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट आते तो नज़ारा कुछ और होता.

कांग्रेस को तुरंत वैसे युवाओं को आगे बढ़ाना होगा जिनका अपना आधार हो.

लालू का फीका पड़ा दम

बिहार में लालू यादव 2019 के लोक सभा चुनाव में नहीं है. इसका फायदा सभी राजनीतिक दल को होगा.

लालू पुत्र तेजस्वी सिर्फ संवाददाता सम्मेलन में आकर्षित करते दिखते हैं या फिर अपनी जाति के बीच.

गांधी मैदान के मंच पर उनका कॉन्फिडेंस कमज़ोर था. इस अवसर पर लालू के कमज़ोर पड़े राष्ट्रीय जनता दल से कांग्रेस बढ़िया बारगेन कर सकती है.

बिहार में जाति और धर्म की बड़ी दीवार

कमज़ोर लालू की अनुपस्थिति में मुस्लिम वोट तेजी से कांग्रेस की तरफ लौटेगा, यह भी कहा जा सकता है.

और जहां तक सवर्ण वोट का सवाल है, वे कांग्रेस के लिए वोट तभी करेंगे जब उनका अपना कैंडिडेट हो. इस बात से तेजस्वी वाकिफ हैं.

राजनीति तो यही कहती है कि बीजेपी के एनडीए गठबंधन के सवर्ण कैंडिडेट के खिलाफ कांग्रेस भी अपने महागठबंधन से सवर्ण उम्मीदवार ही आगे लाए.

रैली में क्या कहा राहुल ने

बिहार की जनता को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि वे अपनी जगह पहचानें. “आपको अपनी जगह नहीं भूलनी. ये नालंदा विश्विद्यालय की धरती है. यहां पहले पूरी दुनिया से लोग आया करते थे. आज जब आपके लोग यूनिवर्सिटी में पढ़ना चाहते हैं तो तीन साल-चार साल में डिग्री नहीं मिलती. पूरा ढांचा बंद पड़ा हआ है.”

राहुल ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने लोगों को हरित क्रांति दी, सफेद क्रांति दी, कंप्यूटर रेवोलूशन दिया, इंटरनेट रेवोलूशन दिया, आईआईटी, आईआईएम, मनरेगा, भोजन का अिधकार, सूचना का अधिकार जैसे ऐतिहासिक काम किए. “हम नरेन्द्र मोदी जी वाली राजनीति नहीं करते, हम जब मन बना लेते हैं तो हम ऐतिहासिक काम करके दिखाते हैं.”

रैली के दौरान मैदान के ऊपर से जा रहे हवाई जहाजों की ओर बार-बार इशारा कर, राहुल ने कहा कि, “मोदी जी अपने उद्योगपति मित्रों को हजारों करोड़ रुपए देते हैं और हिंदुस्तान के किसानों को चंद रुपए.”

दो-दो हाथ के लिए तैयार कांग्रेस   

जातीय गठबंधन के मामले में बिहार कांग्रेस की कोशिश हो भी रही है कि सवर्ण के मजबूत उम्मीदवारों को लुभाया जाए. लेकिन, एक लोक सभा क्षेत्र में करीब 1600 मतदान केंद्र होते हैं जहां सिर्फ चुनाव के दिन करीब 5000 कार्यकर्ता चाहिए होते हैं.

मतलब यह कि प्रति मतदान केंद्र एक उम्मीदवार को तीन कार्यकर्ताओं की जरूरत पड़ती है. शायद इसीलिए कांग्रेस इस कोशिश में है कि पुराने लड़ चुके उम्मीदवारों को अपनी तरफ खींचा जाए.

कुछ ऐसी ही रणनीति पिछले चुनाव में बीजेपी की थी, जब उसने कांग्रेस के पुराने दिग्गजों को अपने टिकट से लड़ाया था.

बहरहाल, इस बार कोई लहर नहीं है – ना गांधी लहर और ना ही मोदी लहर.

बहुत कुछ उम्मीदवारों की व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करेगा और यहां राहुल गांधी के इर्द गिर्द वाले किस तरह की रणनीति तैयार करते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है.

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