रेडियो की बात

आज कोई कार नहीं है जिसमें रेडियो नहीं बजता. रेडियो तब भी था और आज भी है; यह एक ऐसा माध्यम है जो अमीर-गरीब के बीच भेदभाव नहीं करता; तब रेडियो वैसे ही संभाल कर रखा जाता था जितना आज लैपटॉप को रखते हैं.

तब सिर्फ दो बैंड होता था – मीडियम वेव और शार्ट वेव. मीडियम वेव पर रेडियो में बहुत कुछ स्पष्ट सुना जा सकता था. लेकिन शार्ट वेव पर ज्यादातर स्टेशन या तो लगते नहीं थे या फिर अजीबोगरीब आवाजों में संदेश प्रसारित करते थे – गूं गां गूं कूँ कां कीईईईइ की की ईईई – जैसे किसी और ग्रह से संदेश प्राप्त हो रहे हों.

तब लकड़ी का कवर होता था. दो बड़ी-बड़ी घुन्डियां होती थीं – एक वाल्यूम के लिए और एक स्टेशन बदलने के लिए. चार बैटरी लगती थी. और चल पड़ता था रेडियो. फिर इसका प्लास्टिक कवर भी आने लगा, क्यूंकि गिरने के बाद उसके कल पुर्जे अलग-अलग हो जाते थे.

आज जैसे आप अपने स्मार्टफोन पर स्क्रीन गार्ड लगाते हैं, वैसे ही रेडियो को कवर लगा कर रखा जाता था. चमड़े, कपड़े और कम्बल का भी कवर बनता था. भले ही 1906 में रेडियो प्रसारण की शुरुआत हुई हो लेकिन यह माध्यम आज भी क्रांति लाने की क्षमता रखता है.

भारत में रेडियो ने अपनी पहुंच बढ़ाई है और यह बेहद शानदार स्तर पर है. जहां एक तरफ सरकारी रेडियो स्टेशनों द्वारा जनता तक ज्ञान का भंडार पहुंचाया जाता है वहीं प्राइवेट रेडियो स्टेशन मनोरंजन को एक अन्य स्तर तक ले जा रहे हैं.

आज देश में 850 टीवी चैनल हैं, जिसको देखने वालों की संख्या करोड़ों में है. उसी तरह रेडियो सुनने वालों की संख्या भी लगभग 50 करोड़ है. रेडियो भारत के लगभग सभी क्षेत्र में 96.4 प्रतिशत लोगों तक पहुंचता है. यह जनसंचार का महत्वपूर्ण यंत्र है और राष्ट्र के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

राष्ट्र के कम पढ़े-लिखे लोगों को इस माध्यम से बड़े ही सरल ढंग से आम बोल-चाल की भाषा में विभिन्न प्रकार की शिक्षा दी जाती रही है. यह जितना रचनात्मक प्रयोग कर सकता है, उतना ही सशक्त जनमाध्यम भी है जिसके द्वारा असंख्य लोगों तक संदेश पहुंचाया जाता है विशेषकर समाज के कमजोर तबके के लोगों तक.

रेडियो ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं. इसे तो मृत माध्यम भी कहा जाने लगा था. लेकिन वर्तमान में यह देशभर के लोगों को जागरूक कर रहा है. 1971 में जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था, उस समय रेडियो के महत्व को पूरे देश के लोगों ने जाना था. तब स्कूलों में सप्ताह में एक दिन क्लास में रेडियो सुनाया जाता था.

रेडियो के लिए इसके श्रोता सबसे महत्वपूर्ण हैं. टीवी में आप देख भी रहे होते हैं लेकिन रेडियो में आप सिर्फ सुन रहे होते हैं. ऐसे में इस माध्यम को लोगों से कनेक्ट करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है. फिर भी इसने देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

रेडियो-श्रोता संबंध कल भी था, आज है और कल भी रहेगा

पिछले एक दशक में भारत में जहां मीडिया का विस्फोट हुआ है उसमें रेडियो का विकास भी हुआ है. देशभर में प्राइवेट एफएम चैनल लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं. इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में जिस तरह से नकारात्मक समाचारों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है ऐसे में रेडियो सुकून देता है. कभी बुजुर्गो और पुराने जमाने के लोगों की पसंद माने जाने वाला रेडियो अब युवा दिलों की धड़कन बन चुका है. सूचना और मनोरंजन के इस युग में एक बहुत बड़ा वर्ग रेडियो के साथ जुड़ चुका है.

आज कोई कार नहीं है जिसमें रेडियो नहीं बजता. खासकर मोबाइल और इंटरनेट पर रेडियो को युवा बड़े चाव से सुनते हैं.

आने वाले समय में स्थानीय स्तर पर रेडियो चैनलों की स्थापना होगी. साथ ही नीतिगत उदारता भी आएगी. रेडियो चैनलों की शुरुआत के लिए कानून यदि अधिक प्रजातांत्रिक और सरल हों तो भारत जैसे देश के लिए यह सुखद होगा. सामुदायिक रेडियो या कम्युनिटी रेडियो का विस्तार ग्रामीणों के उत्थान के लिए अति आवश्यक है.

व्यवस्था तो ऐसी बने कि कुछ क्रियाशील लोग भी रेडियो स्टेशनों की शुरुआत करने की हिम्मत जुटा सकें. आजकल की तेज रफ्तार ज़िन्दगी में लोगों के पास वक्त कम होता जा रहा है और वे कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेना चाहते हैं. इसी वजह से रेडियो अधिक सुविधाकारी है. रेडियो के प्रस्तोता का अपने सुनने वालों से आवाज का एक अनदेखा पर बहुत ही करीब का रिश्ता बनता रहे, और रेडियो चलता रहे. क्यूंकि यह कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा.

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