मोदी को गंगा डूबा न दे

चुनावी बिगुल बजते ही भारत के सबसे अहम संसदीय क्षेत्र वाराणसी की बढ़ती राजनीतिक गहमा-गहमी देश में चर्चा का केंद्र बन गई है. प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेन्द्र मोदी का यहां के चुनावी अखाड़े में एक बार फिर उतरना तय माना जा रहा है. लेकिन, साथ ही यह भी तय है कि इस बार मां गंगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कई सवालों का जवाब मांगेंगी.

वाराणसी से इस बार मुकाबले में ‘नरेन्द्र मोदी’ नहीं बल्कि ‘प्रधानमंत्री’ मोदी उतर रहे हैं. जिन सवालों को उठाकर वह यहां से सांसद और फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, उन्हीं प्रश्नों का अब उन्हें सामना करना पड़ेगा. तब वह मुख्य रुप से सत्ताधारी कांग्रेस के नेताओं से सवाल पूछते थे. वही अब उनसे सवाल पूछेंगे. 

वाराणसी संसदीय क्षेत्र और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

कांग्रेस की महासचिव और वाराणसी संसदीय क्षेत्र समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री मोदी की गंगा सफाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं जैसे ज्वलंत मुद्दे पर उन्हें घेरने का अभियान शुरु कर दिया है.

प्रियंका ने राजनीतिक लड़ाई का मुख्य ‘अखाड़ा’ वाराणसी को बनाया है. इस वजह से यहां पहले से अधिक रोचक मुकाबला होना तय है. प्रियंका प्रयागराज से गंगा के रास्ते वाराणसी तक ‘जल एवं रोड शो’ के लिए मुख्य रुप से पिछड़े वर्ग को साधने का अपना अभियान शुरु करने जा रही हैं.

वैसे, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से मुकाबले के लिए प्रमुख दल समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) ने गठबंधन बनाया है. गठबंधन के तहत वाराणसी सीट सपा के हिस्से आई है.

कांग्रेस ने अब तक अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन इसी बीच भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनावी मुकाबला करने की घोषणा कर सब को चौंका दिया है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी एवं बीजेपी की विचारधारा का विरोध करने वाले तमाम नेता एवं दलों से समर्थन मांगा है. 

चंद्रशेखर को आम आदमी पार्टी (आप) का समर्थन भी मिलने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन के साथ आप एवं कांग्रेस का समर्थन मिलने की स्थिति में दलित नेता चंद्रशेखर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं.

वाराणसी में नरेन्द्र मोदी ने तब क्या कहा था

वर्ष 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेन्द्र मोदी ने इस प्राचीन धार्मिक नगरी के साथ-साथ अपने गृह राज्य गुजरात के वड़ोदरा संसदीय क्षेत्र से भी चुनावी मुकाबला किया था तथा दोनों जगहों पर भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी. फिर, उन्होंने वड़ोदरा सीट से इस्तीफा देकर संसद में वाराणसी का प्रतिनिधत्व करने का फैसला किया था.

बीजेपी द्वारा प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित होने के कारण तब नरेन्द्र मोदी ने कोई जोखिम नहीं लिया था और अपनी जीत पक्की करने के लिए दो जगहों से मुकाबला किया था.

नरेन्‍द्र मोदी ने वड़ोदरा लोक सभा सीट से इस्‍तीफा देते समय कहा था कि वाराणसी का प्रतिनिधित्‍व करते हुए वह ‘गंगा की सेवा करने और वाराणसी के विकास के लिए कार्य करने की आशा करते हैं’.

नरेन्‍द्र मोदी ने वड़ोदरा लोक सभा सीट से इस्‍तीफा देते समय कहा था कि वाराणसी का प्रतिनिधित्‍व करते हुए वह ‘गंगा की सेवा करने और वाराणसी के विकास के लिए कार्य करने की आशा करते हैं’. 

इस साल फिर गुजरात से हो सकती है उम्मीदवारी

संभव है 2019 के लोक सभा चुनावों में भी प्रधानमंत्री मोदी दो जगहों से अपना परचा भरें. वाराणसी के साथ-साथ गुजरात के गांधीनगर लोक सभा सीट से भी उनकी उम्मीदवारी हो सकती है.

चूंकि नरेन्द्र मोदी को उनकी पार्टी बीजेपी ने फिर से प्रधानमंत्री की दूसरी पारी के लिए प्रोजेक्ट किया है, इसलिए वाराणसी से उनका चुनाव लड़ना तो तय माना जा रहा है, जिस वजह से वाराणसी संसदीय क्षेत्र एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है.   

  • वाराणसी में चुनाव अंतिम चरण यानी 19 मई को होने हैं. प्रधानमंत्री मोदी के इस संसदीय क्षेत्र में उनके अगले कदम को लेकर चर्चा जोरों पर है.
  • ध्यान देने की बात है कि इस बात पर चर्चा नहीं हो रही कि वाराणसी से कौन जीतेगा, बल्कि लोगों के लिए विषय यह है कि यहां से नरेन्द्र मोदी यदि फिर चुनाव लड़ते हैं तो उनके जीतने का अंतर वर्ष 2014 के मुकाबले बढ़ेगा या घटेगा.

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार मुक्त चौतरफा विकास का दावा कर रहे हैं. आजादी के बाद गत पांच वर्षों में सबसे अधिक विकास कार्य करने के उनके दावे एवं प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया की चंद ताकतवर हस्तियों में सुमार उनकी छवि वाराणसी के मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है, यह जानना महत्वपूर्ण होगा.

सत्ताधारी बीजेपी नेताओं का कहना है कि जीत का अंतर बढ़ने में उन्हें कोई संदेह नहीं, लेकिन विरोधियों से लेकर कई आम नागरिकों को लगता है कि सपा-बसपा गठबंधन के साथ कांग्रेस का समर्थन किसी ‘ताकतवर’ नेता को मिला तो इस बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए जीत की राह आसान नहीं होगी. ऐसे में दलित नेता चंद्रशेखर चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं.

स्थानीय निवासी यह मानते हैं कि नरेन्द्र मोदी के यहां से सांसद होने के कारण कई सड़कों और बिजली की व्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन जिस अस्सी घाट पर उन्होंने गंगा को स्वच्छ करने का संकल्प लिया था, उस दिशा में कोई खास काम नहीं हुआ.

इसी घाट के पास नाले में तब्दील हो चुकी अस्सी नदी से मल एवं गंदा पानी पांच साल पहले की तरह आज भी गिर रहा है. इस पर कोई काम नहीं हुआ. सफाई के नाम पर कराड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए हैं. कई लोग रोजगार एवं किसानों के जमीन का उचित मुआवजा का मुद्दा उठा रहे हैं.

वहीं, बीएचयू की कई छात्राओं ने बेटियों की सुरक्षा को कागजी बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान पुलिस एवं विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों ने उन पर लाठी चार्ज किया.

लोगों का यह आरोप भी है कि प्रधानमंत्री मोदी की अति महत्पूर्ण योजना ‘स्च्छ भारत अभियान’ की सफलता आमतौर पर उन्हीं इलाकों तक सिमट कर रह गई है, जहां वीआईपी नेताओं का आना जाना लगा रहता  है, जबकि अधिकांश क्षेत्रों में सफाई आज भी भगवान भरोसे है.

हालांकि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर केंद्र एवं राज्य के तमाम मंत्रियों एवं आला अधिकारियों ने समीक्षा करने एवं आदेश देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन उसका परिणाम नहीं दिखा.

ज्ञात हो कि 2014 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी से पर्चा भरने से पहले कहा था: “मुझे बीजेपी ने वाराणसी नहीं भेजा है, ना ही मैं खुद आया हूं. मुझे ‘गंगा मां’ ने बुलाया है.”

ज्ञात हो कि 2014 में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी से पर्चा भरने से पहले कहा था: “मुझे बीजेपी ने वाराणसी नहीं भेजा है, ना ही मैं खुद आया हूं. मुझे 'गंगा मां' ने बुलाया है.”

गौरतलब है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी ने 5,81,022 मदाताओं का समर्थन हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 2,92,038 मतदाताओं के समर्थन के साथ दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था.

तब कांग्रेस के तत्कालीन विधायक अजय राय को 75,614 और बसपा के विजय प्रकाश जायसवाल को 60,579 मत लेकर तीसरे और चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा था.

तो क्या वाराणसी, जो भारत की विरासत में पहले ही विशेष स्थान बना चुका है, अब एक नया इतिहास रचने के लिए तैयार है?

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