सियासत का ‘मुहल्ला’ स्तर और टैक्स-फ्री मनोरंजन

क्या भारतीय राजनीति अपनी गंभीरता खोकर एक ‘मुहल्ला क्लीनिक’ के झगड़े जैसी होती जा रही है? जहां प्रधानमंत्री की सुरक्षा की चिंता से लेकर स्पीकर के केबिन में कथित ‘धमकी’ तक की कहानियां बुनी जा रही हैं. यह लेख वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर एक पैना और व्यंग्यात्मक प्रहार है. हालिया घटनाक्रमों और बयानों को जोड़कर देखा जाए, तो एक विचित्र तस्वीर उभरती है. नीचे दिए गए विचारों में उसी विडंबना को शब्दों में पिरोया गया है.

महिला सांसद प्रधानमंत्री को चिकोटी या दांत ना जाने क्या काटने वाली हैं

संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने इल्जाम लगाया है कि प्रियंका गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस के सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के केबिन में उन्हें धमकाया और गाली-गलौच की. ओम बिरला जी इतने आहत हैं कि सदन में नहीं आना चाहते.

इससे पहले खुद ओम बिरला ने ये बताया था कि उन्हें पक्की जानकारी मिली है कि कुछ महिला सांसद प्रधानमंत्री को चिकोटी या दांत ना जाने क्या काटने वाली हैं. बेचारे प्रधानमंत्री इतना डरे कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद देने के लिए भी लोकसभा नहीं आए.

अगली खबर आपको ये मिल सकती है कि प्रियंका गांधी ने ओम बिरला की घड़ी छीन ली और उनके कुर्ते से 120 रुपये भी निकाल लिए.

भारतीय राजनीति में आए दिन ऐसे बयान सामने आते हैं जो संसदीय गरिमा और गंभीरता के मानकों को चुनौती देते हैं. हाल ही में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुए वाकयुद्ध, और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा व्यक्त की गई ‘असुरक्षा’ ने एक नई बहस को जन्म दिया है. यह लेख उसी विडंबना को रेखांकित करता है जहां गंभीर मुद्दे पीछे छूट गए हैं और ‘एंटरटेनमेंट’ हावी है.

आपको याद है ना, बीजेपी का एक सांसद राहुल गांधी के ‘धक्के’ से ‘बेहोश’ हो गया था और उसे आईसीयू में भर्ती करवाना पड़ा था.

उस गंभीर चोट का कोई फॉलो अप नहीं आया. ठीक उसी तरह जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देने के इल्जाम में चुनाव से पहले बिहार बंद हुआ लेकिन गालीबाज का क्या हुआ किसी को पता नहीं.

नरेंद्र मोदी वो ‘विश्व नेता’ हैं, जिन्हें 18-18 घंटे काम करके दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति को मुहल्ला स्तरीय बनाने का श्रेय जाता है. राजनीति जमीन से जुड़ी बल्कि जमीन पर लोटती रहे तो ही अच्छा है.

जनता को कोई शिकायत नहीं है क्योंकि और कुछ मिले या ना मिले टैक्स फ्री एंटरटेनमेंट मिल रहा है.


  • व्यंग्यात्मक शैली में समकालीन राजनीति पर टिप्पणी राकेश कायस्थ के हैं.

क्या आपको भी लगता है कि हमारी राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है, या यह सब सिर्फ एक ‘टैक्स-फ्री एंटरटेनमेंट’ है? अपनी बेबाक राय हमें नीचे कमेंट सेक्शन में बताएं. इस लेख को साझा कर लोकतंत्र की इस नई दिशा पर बहस शुरू करें.