विज्ञापन दुनिया का नवीनतम मंत्र

वे दिन गए जब कंपनियां हमेशा आकर्षक पैकेजिंग, ऑफर और मूल्य निर्धारण पर ध्यान केंद्रित करा करती थीं. अब उनका लक्ष्य ग्राहकों के दिमाग में जगह बनाने से बढ़कर यह भी है कि ग्राहकों के दिलों से कैसे जुड़ पाएं.

आजकल टेलीविज़न प्रचारों – जिन्हें कमर्शीयल्स कहते हैं – में भौतिकवादी रूप में सिर्फ भावनाओं का प्रोडक्शन हो रहा है, जिनका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ता नज़र आ रहा है.

वास्तविक जीवन के अनुभवों के बलबूते पर विज्ञापनों को भावनाओं से जोड़ना नया ट्रेंड बन गया है.

विदेशों में भी यह प्रचलन काफी मशहूर है. वो इंश्योरेंस कंपनी हो या गहनों का कोई ब्रांड, सभी के विज्ञापनों को एक भावनात्मक रूप देने पर लोग उन्हें ज्यादा समय तक याद रखते हैं.

गूगल अपने एक विज्ञापन में तो भारत-पाकिस्तान के संबंधियों को जोड़ता दिखता है, जो विज्ञापन लोगों ने खासा पसंद किया.

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पाकिस्तान और भारत के विभाजन के विषय पर बनाया गया गूगल का विज्ञापन पाकिस्तान में भी यूट्यूब पर (पाबंदी के बावजूद) बहुत लोकप्रिय हुआ.

‘रि-यूनीयन’ या ‘फिर मिलन’ नामक यह विडियो दो बचपन के दोस्तों के बारे में है जो पाकिस्तान और भारत के 1947 में विभाजन के बाद बिछड़ जाते हैं और दोनों ने एक दूसरे को कई दशकों से नहीं देखा है.

विभाजन के बीच दोस्ती का पैगाम देता गूगल का यह विज्ञापन इंटरनेट पर कभी वायरल हो गया था.

सच में, कंपनियां अपने विज्ञापनों को भावनात्मक बनाना पसंद कर रही हैं, जिसके लिए वे अनेक टैगलाइन्स का सहारा ले रही हैं, जैसे फॉर्च्यून मतलब घर का खाना. शब्दों का होशियारी से प्रयोग ही इसकी कला है. 

हममें से अधिकतर लोगों की घर के बने भोजन की अच्छी यादें हैं, और इसी वजह से हम इस प्रचार से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर पाते हैं.

डाबर वाटिका महिला कैंसर के उत्तरजीवियों को सलाम करता है. अपने सुंदर अभियान में यह कैंसर से बाहर निकली महिलाओं को शुभकामनाएं देता है.

टाटा टी- जागो रे, डव इंडिया- लेट्स ब्रेक द रूल्स ऑफ ब्यूटी, वोडाफोन सुपरनेट के साथ एक सुपर डैड बनें- उन प्रचारों के उदाहरण हैं जो शब्दों के सटीक प्रयोग से प्रोडक्ट बेचने के साथ-साथ दिल में एक उद्देश्य जगा कर आपसे भावनात्मक रूप में जुड़ने का भी प्रयास करते हैं. 

केरल की जोयालुकास कंपनी ने भी इस तरह के विज्ञापन का इस्तेमाल किया, जिसमें हमारे सामने अभिनेत्री काजोल की एक दिव्यांग फैन की शादी का दृश्य है और काजोल खुद उसे एक खूबसूरत हार उपहार में देने पहुंच जाती हैं.

विराट कोहली और अनुष्का शर्मा को फीचर करते मान्यवर के विज्ञापन में ब्रांड का नाम किसी को याद रहे या ना रहे, दर्शाए गए विरुश्का के वचन सभी के दिलो-दिमाग पर छा गए और एक बार फिर मान्यवर और मोहे मार्केट में सर्वश्रेष्ठ ब्रांड के रूप में उभर कर सामने आया.

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कुछ विज्ञापनों की सफलता देखते हुए यह भी कहा जा सकता है, कि जब किन्हीं कारणों से कुछ विज्ञापन हिट हो जाते हैं, तब अन्य कंपनियां भी उन फार्मूलों को अपनाने लगती हैं जिसकी वजह से उनके मुताबिक़ पहली कंपनी का विज्ञापन हिट हुआ हो.

इस फार्मूलों में शामिल हैं विज्ञापनों में रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को स्टोरीलाइन बनाना, कहीं से भी एक लव एंगल देना, ग्राहकों के मन में एक उद्देश्य जगाना और सबसे महत्वपूर्ण खुद को दूसरों से अलग एवं बेहतर साबित करना.

विज्ञापनों में एक भावनात्मक एंगल देने के प्रयास में कई विज्ञापन अपने ही जाल में भी उलझते नज़र आते हैं, जहां बदलाव दिखाने की आड़ में कहीं न कहीं दर्शकों तक एक भ्रामक संदेश दे दिया जाता है. ऐसा ही वूट ऐप एवं फर्स्ट क्राय वेबसाईट के विज्ञापनों के साथ यह देखने को मिला.

वूट ऐप के विज्ञापन में दर्शाया गया कि वूट ऐप के यूज़र्स बैकवर्ड चलती दुनिया में फार्वर्ड चलने वाले होते हैं. ये लोग मोबाइल में इस ऐप पर प्रोग्राम देखने में इतने मशगूल हैं कि सड़क क्रॉस करते, स्विमिंग पूल के पास चलते, शौपिंग करते वक्त भी इनका ध्यान अपने मोबाइल पर ही है. जी हां, आप लोग तो वाकई अलग हुए सबसे, पर फॉरवर्ड या बेहतर कतई नहीं.

फर्स्ट क्राय के विज्ञापन में छोटे-छोटे बच्चे अपनी मां को ‘मैड’ और ‘क्रेजी’ कहते नज़र आते हैं. अब भला ये कहां से तार्किक है, खुद ही सोचें.

बहरहाल, पब्लिसिटी अच्छी हो या बुरी, कंपनियों के लिए अक्सर फायदेमंद ही साबित होती है. फंसता है कोई, तो वह है ग्राहक. आप अपनी ज़रूरतों और समझ से ही प्रोडक्ट्स का चुनाव करें.

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