अदभुत मेरा गांव मलाही

कितना सुंदर, कितना अदभुत मेरा गांव मलाही. गंडक नदी के किनारे बसा मेरा गांव. पूर्वी चंपारण जिले की हर सड़क मानो मेरे ही गांव से शुरू होती हो और यहीं खत्म होती हो. मुझे तो लगता है मेरी हर यात्रा मेरे गांव से ही शुरू होती है.

मैंने जीवन का सफर बहुत छोटी उम्र में ही शुरू किया. तब कुछ भी पता नहीं था — मैं कौन हूँ, कहां जाना है. कैसे-कैसे सपनों का पीछा करते-करते आज मैं कहां खड़ा हूँ. परंतु किसका पीछा कर रहा था, अब तक.

मेरी कई पीढियां मलाही में रहीं. मेरे पूर्वज मलाही में रहे. आज अमेरिका से कहीं भी जाने का अवसर मिलता है तो मैं छूटते ही छलांग लगा देता हूँ, अपने गांव. पृथ्वी पर शायद यह सबसे सुंदर जगह है.

गांव पहुंचते स्वतः ही खुशियां चेहरे पर लकीरें बनाने-मिटाने लगती हैं, कितना अपनापन, कितनी शांति, कितनी प्योर फीलिंग्स. कितना प्यार, कितना सम्मान. भूमि में कितनी पवित्रता.

मेरे गांव में जात-पात की बू नहीं, छुआ-छूत नहीं. बिहार राज्य में यह रोग होगा, देश में भी जगह-जगह फैला है. पर मेरा गांव, इन सबसे दूर — खुले गगन की छांव में शांत, खुशहाल. हर खेत में प्रेम की फसल लगी है.

हां इंटरनेट नहीं है, लेकिन प्रकृति का अनुचित दोहन भी नहीं है. दुनिया भर की बेकार, फ़ालतू बातों से बहुत दूर अपने में कितना बड़ा समुंदर है मेरा गांव. बिलकुल अलग.

इसकी सादगी कितनी मोहक, कितनी आकर्षक. क्या संस्कार दिया है मुझे मेरे गांव ने. सभी एक दूसरे को जानते हैं, पहचानते हैं, बतियाते है, मदद करते हैं. चाय और कहानियां मुफ्त मिलती हैं. हर रंग देखने को मिलते हैं. यहां डॉक्टर भी हैं, ड्राईवर भी, अमीर हैं, गरीब भी. बिजली नहीं है, पर प्यार क्या कम है.

खुशियों के लिए सुविधाओं का होना शायद उतना जरूरी नहीं.

गत दिनों जब गांव पहुंचा तब करीब 80 बच्चों से मिला. उनकी आंखों में मुझे हीरे की चमक दिखी. इस पीढ़ी के लिए एक बेहतर जगह बना पाऊं, शायद. उनके सपनों को वहीं साकार करा पाऊं, शायद.

मुझे ग्लानी होती है, मैं यहां अमेरिका आ गया. गांव में कितना कुछ कर सकता था. क्या आज भी कुछ कर सकता हूँ?

करने के लिए कितना कुछ है. मैंने उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं. मेरी यात्रा अभी बाकी है.

– अभिषेक कुमार | मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय, बोस्टन, अमेरिका

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