हम सब एक हैं

“आज इंसान गांव से शहर और शहर से विदेश में घर बनाता है, पर हम लोग एक दूसरे के दिल में घर नहीं बना पाते”. जी हां, इसी पीड़ा के साथ 58 वर्षीय मो. हनीफ खां शास्त्री ने हिंदी और संस्कृत में अपने साहित्यिक योगदान के माध्यम से हिंदू और मुस्लिम धर्मों के बीच समानताओं को उजागर कर सांप्रदायिक सदभावना को बढ़ाने के लिए काम किया है. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के संगम सोनभद्र में जन्मे हनीफ खां को अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगाने की सलाह 1994 में एक पुस्तक लोकार्पण समारोह के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने दी. खां शास्त्री हैं एक मुसलमान, जिन्हें है हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ ‘महाभागवत गीता’ का अथाह ज्ञान. इनका मानना है कि गीता और कुरान करीब-करीब एक जैसी ही बातें कहते हैं. “अगर इन्हें एक दूसरे का प्रतिबिंब कहा जाए तो भी शायद गलत नहीं होगा.” राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सोहार्द पुरस्कार 2009 से सम्मानित खां शास्त्री ने इसी धार्मिक एकता भाव को ‘भारत बोलेगा’ के साथ बयां किया:

संस्कृत भाषा में आप की रुचि कैसे?

Md.-Hanif-Shashti-with-a-copy-of-Geeta.-Photo-Parul-Tyagi-for-Bharat-Bolega.मैं एक साधारण परिवार से हूँ. मेरे परिवार में कोई भी शिक्षित नहीं था. मैं बकरियां चराने अपने बगल वाले स्कूल में जाता था तो छुप-छुपकर सबको पढ़ते-पढ़ाते देखता था. एक दिन एक अध्यापक ने मुझे पकड़ लिया और मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया. अध्यापक ने मेरे घर वालों को मनाया और मैने पढ़ाई आरम्भ कर दी. उस समय वहां संस्कृत ही पढ़ी जाती थी. बस, तभी से संस्कृत से लगाव हो गया.

हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रन्थ महाभागवत गीता से आपका इतना प्रेम क्यों?

एक बार मैं हाई स्कूल में फेल हो गया. मैं बहुत उदास हुआ. तभी मेरे गुरु पंडित लखन लाल शास्त्री को मुझ पर दया आयी और उन्होंने मुझसे कहा कि तुम भागवत गीता का एक अध्याय रोज पढ़ो. मेरा विश्वास है कि तुम्हारी सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी. मैने धीरे-धीरे पढ़ना आरम्भ किया और मुझे सफलता मिलती चली गयी.

क्या आज भी गीता अध्ययन आपकी दिनचर्या में शामिल है?

हां, मैं आज भी गीता के एक अध्याय का प्रतिदिन अध्ययन करता हूँ. कई बार जब मैं बाहर रहता हूँ या सफर में रहता हूँ तो गीता की एक छोटी-सी प्रति हमेशा अपनी जेब में रखता हूँ.

क्या कुरान भी आप बचपन से पढ़ते हैं?

मुझे अरबी और उर्दू भाषा पढ़नी नहीं आती थी. मेरी बेगम कैसर बानो उर्फ मुन्नी बेगम ने मुझे कुरान पढ़ना सिखाया और बाद में धीरे-धीरे कुरान में मेरी जिज्ञासा बढ़ती चली गयी.

आप एक मुसलमान हैं और गीता का अध्ययन और प्रचार ! क्या मुसलमानों ने कभी आपका विरोध नहीं किया?

विरोध किया, बहुत किया और कुछ लोग तो आज भी करते हैं. लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि जो हमारा इस्लाम कहता है और जो कुरान में लिखा है, गीता उसकी रूह है. जिन बातों का गीता में उल्लेख किया गया है वही सब कुरान की आयत में भी लिखा है.

कभी आपकी भावना को ठेस पहुंची हो और आपको लगा हो कि काश मैं मुसलमान न होता?

आज तक मैंने यह तो नहीं सोचा कि मुझे मुसलमान नहीं होना चाहिए लेकिन एक बार मेरे साथ ऐसे हुआ जो मुझे लगता है कि शायद मुसलमान होने का नुकसान था. राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान में मेरी नियुक्ति 1982 में हुई थी और मुझे शोध सहायक पद के लिए चुना गया था. प्रत्येक दस वर्ष पर पदोन्नति होती है. मेरे पास वो सारी योग्यताएं है जो एक वाईस चांसलर के पास होनी चाहिए. आज 29  साल बीत गये, लेकिन मेरे पदोन्नति अभी तक नहीं हुई.

कभी विदेश में पढ़ाने का मौका मिला हो?

हां. अरब और अफगानिस्तान से मुझे पढ़ाने के लिए वहां की सरकारों ने भारत सरकार से दरख्वास्त की थी और मुझे अफगानिस्तान बतौर प्रोफ़ेसर भेजा गया. उस समय वहां पर तालिबान की सरकार थी. तमाम बड़े पदों पर बैठे लोग और राजनेता तक हमारी कक्षा में पढ़ने आते थे. एक दिन तालिबानी गिरोह ने मुझे अपने सम्मेलन में बुलाया. मैं वहां गया तो कोई सम्मेलन वहां नहीं हो रहा था बल्कि 4 – 5 लोग एक कमरे में बैठे हुए थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं हिन्दू हूँ या मुसलमान. मैंने कहा कि मैं न हिन्दू हूँ और न मुसलमान, मैं बस एक भारतीय हूँ जिसने एक इस्लाम परिवार में जन्म लिया है और यहां इस्लामिक शिक्षा देने के लिए आया हूँ. उसके बाद उन्होंने मुझे छोड़ दिया. तभी मुझे भारत सरकार ने वापस बुला लिया था.

मुसलमान और ईसाई को एक ही वंश का माना जाता है. फिर ये भी क्यों विवाद का चोला पहन रहा है?

हां, ऐसी मान्यता है कि मुसलमान और ईसाई के पूर्वज एक ही हैं. आपसी राजनीति और नादानी से विवाद जन्म लेता है और नासमझी के कारण वह अड़ियल रूप धारण कर लेता है. बाइबल और कुरान दोनों ही आपसी प्रेम से रहने की हिदायत देते हैं.

आपके नाम में हिन्दू और मुस्लिम दोनों का समन्वय कैसे?

मैने एक पुस्तक कुरान और वेद के समन्वय से ‘महामंत्र गायत्री सुबह फातेहा’ लिखी जिसका विमोचन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने किया था. उन्हीं के द्वारा मुझे शास्त्री उपाधि मिली.

भारत में राजनीति को धर्म के साथ तोला जा रहा है. आप क्या सोचते हैं?

गीता के तीसरे अध्याय के 26 वें श्लोक में कहा गया है कि समाज के लोगों की बुद्धि जहां जैसी भी लगी हुई है उसे वहां लगी रहने दो. किसी के दिल दिमाग को फेरना अच्छी बात नहीं है. अपने ज्ञान को आचरण में समाहित करें तभी हम आगे बढ़ सकते हैं. अपने राजनेताओं को यही कहना चाहूँगा कि वो धर्म के नाम पर आम जनता को बरगलाने की कोशिश ना करें अन्यथा इससे भारत को ही नुकसान पहुंचेगा. इससे बड़ा अपराध कोई नहीं है.

आज भारत में धार्मिक एकता विखंडित होती जा रही है…

हमारे देश के ऋषियों ने बताया है कि हमारे भरण-पोषण की क्षमता हमारी धरती इतनी है. यहाँ सभी को समान जगह प्राप्त है. हमे प्रश्रय देने वाला सूरज एक है. हवा एक है. हमारे आदि माता-पिता एक हैं. इसलिये हम सब एक हैं — न कोई हिन्दू, न कोई मुस्लिम न कोई सिख, ईसाई. हम सब हैं भाई-भाई. हमें भारत देश की रक्षा करनी है. एक मुसलमान होकर साम्प्रदायिक सोहार्द में एक पहल मैने किया, क्योंकि में चाहता हूँ कि मुझे देखकर लोगों में प्रतिस्पर्धा जगे. हमें अपनी एकता मजबूत कर भारत देश को एक सशक्त राष्ट्र बनाना है.

चर्चा में