फिल्म समीक्षा: लाल पत्थर

“यहां के हर पत्थर में एक खून की दास्तां छुपी हुई है”, ऐसे ही कुछ संवादों के साथ शुरू होती है 1971 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘लाल पत्थर’.

सुशील मजूमदार द्वारा निर्देशित यह फिल्म कहानी है प्यार में ईर्ष्या, शक और बदले की आग में झुलसे इंसानों की.

फतेहपुर सिकरी की सुंदरता को दर्शाती इस फिल्म को ख़ास बनाता है हमेशा खूबसूरत और सकरात्मक रोल निभाने वाली हेमा मालिनी का किरदार.

lal patthar

राज कुमार, हेमा मालिनी, राखी गुलज़ार, विनोद मेहरा द्वारा अभिनीत यह सिनेमा कहानी है रायनगर के कुमार बहादुर ज्ञानशंकर राय (राज कुमार) की जिनके परिवार को रानी सोनमणि का श्राप लगा हुआ है, जिसके अनुसार उसके घर में कोई भी शादीशुदा सुखी नहीं रह सकता.

ज्ञानशंकर बिना शादी किए प्रजा की सेवा में व्यस्त रहता है. फिर द्वारका दिवेचा के छायांकन से बंधे हुए सिनेमा में आती है एक लड़की, सौदामनी (हेमा मालिनी) जिसे ज्ञानशंकर डाकूओं से बचा कर घर ले आता है. ज्ञानशंकर को सौदामनी से प्रेम हो जाता है और दोनों श्राप से बचने के लिए शादी किए बिना साथ रहने लग जाते हैं.  

ज्ञानशंकर प्यार से सौदामनी को माधुरी बोलने लगता है और उसको पढ़ाने  में इतना मशगूल हो जाता है कि अपनी ढलती उम्र पर ध्यान ही नहीं देता. शंकर जयकिशन के संगीत से संजोए हुए इस सिनेमा में मोड़ तब आता है जब माधुरी की आदतों से परेशान ज्ञानशंकर को सुमिता (राखी गुलज़ार) मिल जाती है जिसके गाने से वह मंत्रमुग्ध हो जाता है.

ज्ञानशंकर सुमिता को उसके घरवालों से खरीद कर शादी कर लेता है. रानी सुमीता का शादी से पहले मित्र होता है जिसका नाम शेखर होता है.

नबेंदु घोष की पठकथा आपको रूबरू कराएगी दो औरतों के बीच आई ईर्ष्या और एक पुरुष के महिला के वस्तुकरण करने की उस कुरीति को जो आज तक चली आ रही है.

‘गीत गाता हूँ मैं’ गाने के साथ राजकुमार के राजस्व अंदाज़, हेमा मालिनी की ईर्ष्या के चित्रण को देखने के लिए लाल पत्थर जरूर देखिएगा.

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