फिल्म समीक्षा: गरम हवा

1973 में एम.एस. सथ्यू द्वारा निर्देशित ‘गरम हवा’ आपको भारत-पाकिस्तान बंटवारे के उस सच से परिचित कराएगी जिसका दुःख आज भी ना जाने दोनों तरफ के कितने परिवारों के दिलोदिमाग़ में छुपा हुआ है. बलराज साहनी, गीता सिद्धार्थ, फ़ारूक़ शेख़ अभिनीत ये सिनेमा आपको रूबरू कराएगा मिर्ज़ा परिवार से जो आगरा में जूतों का कारोबार करते हैं.

परिवार के मुखिया दो भाई हैं जिनमें से एक हलीम मिर्ज़ा अपनी विफल राजनीति के कारण परिवार के साथ पाकिस्तान चले जाते हैं, वहीं दूसरे भाई सलीम मिर्ज़ा को लगता है कि भारत में हिन्दू-मुसलमान के रिश्तों में थोड़ा सुधार आ जाएगा.

हर एक परेशानी को अल्लाह मियां के हवाले छोड़कर सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) भारत में हर एक मुश्किल का सामना करते हैं, चाहे वो भाई के नाम हवेली होने के कारण सरकार द्वारा बेघर कर देना हो या गुस्साए हुए लोगों द्वारा उनका कारखाना जला देना हो. सलीम मिर्ज़ा की बेटी अमीना मिर्ज़ा (गीता सिद्धार्थ) को जहां बंटवारे के कारण दो बार प्यार में धोखा मिलता है, वहीं उनके बेटे सिकंदर मिर्ज़ा को सुशिक्षित होने के बाद भी अपने मज़हब के कारण नौकरी नहीं मिलती.

इस्मत चुगतई की अप्रकाशित कहानी पर आधारित कैफी आज़मी द्वारा लिखित इस सिनेमा को शब्दों में बयां करना उतना ही मुश्किल है जितना बंटवारे के समय मज़हब से आंके जाने वाले आम इंसान के लिए दो वक़्त की रोटी खाना. ‘गरम हवा’ में हर एक किरदार अपने साथ एक असमंजस, एक व्यथा लेकर चलता है, जो दर्शाती है उन लाखों इंसानो की कहानी जो 1947 में दो टुकड़ो में बांट दिए गए.

सलीम मिर्ज़ा का हर बार किसी अपने को रेल से पकिस्तान विदा करना, उनकी बेगम का हवेली छोड़कर जाते समय चूल्हा तोड़ना, दादी का अंत समय में किराए के घर से हवेली तक जाने तक जैसे कुछ दृश्य आपके ह्रदय को झकझोर देंगे. ईशान आर्य का चलचित्रण आपको अन्य सिनेमा की चकाचौंध से विपरीत साधारणता से जोड़ेगा. देखिएगा जरूर विभाजन को दर्शाती ‘गरम हवा’.

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