बेटा न हुआ तो बेटी की जान लेंगे!

क्या आज भी लोग बेटा और बेटी में फर्क करते हैं? क्या आज भी हम अपने बच्चों को नंबर कम आने पर मारते हैं? क्या हमें अपने बच्चे को समझने के लिए कोई क़ानून पढ़ना होगा या हमें कोई यह बताने आएगा कि हम अपने बच्चे से कैसा बर्ताव करें.

हर्षा रुआंसी होकर मुझसे मिलने आई. करीबन दस मिनट तक रोती ही रही. फिर उसने अपनी समस्या बतानी शुरू की. उसकी बातें सुन कर मैं दंग रह गई.

बेटा और बेटी में फर्क

यह जान कर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि हर्षा के जन्म के समय उसके पिता वास्तव में एक बेटा चाहते थे. बेटी होने पर उन्हें क्रोध आ गया, जो आज 14 सालों बाद भी शांत नहीं हो पाया है.

साथ ही वे कभी भी किसी के सामने ये सच्चाई प्रकट नहीं होने देना चाहते थे कि उन्हें बेटी नहीं बल्कि बेटा चाहिए था. वहीं घर के अंदर वे बेरुखी के साथ हर्षा से पेश आते थे.

हर्षा ने जो मुझे बताया वह निंदनीय है. हर छोटी बड़ी बात पर उसे घर में डांटना-मारना बदस्तूर चलता रहा है. कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?

आजकल स्कूलों में अध्यापकों पर बहुत सख्ती है. बच्चों के साथ सख्ती से पेश आने पर अभिभावक छोटी मोटी बात को लेकर भी स्कूलों पर हमला बोल देते हैं. ऐसे में हर्षा के पिता का उसे घर में मानसिक व शारीरिक पीड़ा देना कितना बड़ा जुर्म है!

बेटा हो या बेटी, हमें बच्चों के मनोभाव को जानना और उनकी क्षमताओं को आंकना बहुत ज़रूरी है. हर्षा के रोते हुए प्रश्नों ने एक बार फिर हमें जगाया है. काश कि हम बेटा और बेटी में भेद भाव करना छोड़ दें, उन्हें एग्जाम के मार्क्स की दौड़ से मुक्त कर सकें, उन्हें वो पंख दे सकें जो मज़बूत और ठोस हों.

जहां तक सवाल हर्षा या हर्षा की हालत से मिलती जुलती परिस्थितियों का सामना कर रहे बच्चों का है, तो उसका एकमात्र विकल्प शिक्षा है.

हर्षा अब अपने घर से बाहर निकल जाना चाहती है. अपनी मां की मृत्यु के बाद उसे अपने घर में अब अच्छा नहीं लगता. न ही उसके पास कहीं बाहर निकलने का विकल्प है.

ऐसे में उसे ज़रूरत है तो बुलंद इरादों, धीरज और शिक्षा की. वह शिक्षा ही है, जो हर्षा के सपनों को उड़ान दे सकती है एवं उसे एक स्वतंत्र ज़िन्दगी दे सकती है.


यह भी पढ़ें: भारत का इतिहास सफल महिलाओं के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ऊंचाइयों को छुआ है.

चर्चा में