भारत में नारीवाद क्यों जरूरी है?

‘नारीवाद’ शब्द का उदय फ्रेंच शब्द ‘फेमिनिस्मे’ से 19 वीं सदी के दौर में हुआ; उस समय इस शब्द का प्रयोग पुरूष के शरीर में स्त्री गुणों के आ जाने अथवा स्त्री में पुरूषोचित व्यवहार के होने के संदर्भ में किया जाता था.

आज के ज़माने में ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है जहां लोग ‘नारीवाद’ के नाम से घृणा ना करते हों. जी हां, यह दुख की बात है कि जिन मुद्दों से लड़ने की आज सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उन्ही मुद्दों को अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर कुछ लोग ऐसे-ऐसे कारण देते नज़र आते हैं कि क्या ही कहने.

भारत बोलेगा अपने पाठकों के लिए अनेक में से कुछ कारण प्रस्तुत करता है जिसके बाद शायद ‘नारीवाद’ शब्द से जुड़ी नेगेटिव धारणाएं दूर हो पाएं और आप समझें कि सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के हर कोने में क्यों ज़रूरी है नारीवाद.

जरूरी है नारीवाद

1. दिल्ली शहर में नवीं कक्षा में पढ़ने वाली सेजल आज इसलिए आश्वस्त नहीं महसूस करती क्योंकि कुछ लड़कों से दोस्ती होने के कारण उसे उसके स्कूल से सस्पेंड कर दिया गया. जिन लड़कों से दोस्ती थी, उनसे सवाल भी नहीं किए गए. पूरे साल सेजल की अध्यापिका ने ना केवल अलग-अलग तरीके से उसका चरित्र हनन किया, बल्कि हर इम्तेहान में बेवजह उसके नंबर भी काटती रहीं. सेजल को आवाज़ मिले, और उसके स्कूल वाले उसकी आवाज़ सुनें, इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

2. सोलह वर्षीय लीलावती पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी है. पढ़ने लिखने में रूचि होने के बावजूद उसे घर के काम संभालने पड़ते हैं. जब उसके छोटे भाई स्कूल जाने के बहाने लड़कियों को छेड़ने निकलते हैं, तब लीलावती उनके लिए घर में खाना बनाती है. लीलावती को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का मौक़ा मिले, और घर के काम काज का बोझ उसके भाई भी संभालें, इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

3. सलोनी चोपड़ा एक मशहूर व्लौगर हैं, जिन्हें अपने बोल्ड अंदाज़ के लिए जाना जाता है. उनकी एक साधारण सी वीडियो पर कई अश्लील कमेंट्स आते हैं. इनमें से एक में तो साफ़-साफ़ यह तक लिख दिया गया है कि उनका बलात्कार होना चाहिए. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

4. हैदराबाद में एमबीए की पढाई कर रही 26 वर्षीय अमृता को रात 11.15 बजे हॉस्टल पहुंचने के लिए 5000 रु का जुर्माना भरना पड़ा. उसके देर होने की वजह थी कहीं से लौटते वक्त एक लंबा रास्ता तय करना, ताकि उसे अपने ही कॉलेज में पढ़ रहे उन 19-20 वर्षीय लड़कों के सामने से ना गुजारना पड़े जिन्हें हर रात शराब पीने की आदत भी है और हॉस्टल से बाहर रहने की इजाजत भी. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

5. क्योंकि एक महिला की प्रोफाइल फोटो में उसकी ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है, तो उसे हर दिन दो-चार ऐसे लोगों के मैसेज तो ज़रूर आ जाते हैं, जो पहला वाक्य ही यौन संबंध की मांग से शुरू करते हैं. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

6. क्योंकि यदि एक महिला वैम्प हो, तो उसका एक दर्दनाक अतीत होना आवश्यक है. यदि नेगेटिव रोल में पुरुष हों, तो उनके अतीत या भविष्य का कोई संबंध नहीं होता. उनके किरदार बस कूल होते हैं, जिनकी छाप सबके दिलों दिमाग में बस जाती है. वह स्वाभाविक रूप से बुरे होना एन्जॉय कर सकते हैं. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

7. फेसबुक और इन्स्टाग्राम पर ऐसे प्रोफाइल्स की कमी नहीं, जहां एक पर एक सेक्सिस्ट मीम्स और जोक्स बना कर पोस्ट किए जाते हों. इसे लाखों, करोड़ों की तादाद में लोग लाइक और शेयर करके इन्हें और बढ़ावा देते हैं. जब एक महिला इस पर आपत्ति जताती है, तो उससे पूछा जाता है कि उसकी ‘जली क्यों?’ फिर उसे लोग ‘सूडो-फेमिनिस्ट’ का खिताब भी दे देते हैं, और घर में बैठ कर चूल्हा संभालने की सलाह भी. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

8. शादी के बंधन में बंधने के बाद जब लक्ष्मी ने अपना सरनेम ना बदलने की इच्छा जताई तो घर वालों ने उसका साथ दिया. सास और पति ने उसे नौकरी करने के लिए भी मंजूरी दे दी. थोड़े मनमुटाव के बाद अपने ससुर जी से लक्ष्मी को जीन्स पहन के बाहर निकलने एवं रात को नाईटसूट पहनने की भी इजाज़त मिल गई. लक्ष्मी जैसे रहना चाहे, जो पहनना चाहे, जो करना चाहे इसके लिए भी उसे घर के मर्दों की अनुमति की ज़रूरत पड़ी, इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

आज अधिकतर औरतें कामकाजी हैं, उन्हें घर और दफ्तर का दोहरा बोझ ढोना पड़ता है. औरतों ने तो आर्थिक उपार्जन करके पुरुषों की ज़िम्मेदारियां बांटी हैं, लेकिन आज भी अधिकतर पुरुष खाना बनाना, घर की साफ-सफाई, बच्चों को संभालना जैसे घरेलू कामों में औरतों का हाथ नहीं बंटाते. इसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था की भर्त्सना करते हुए किसे ने कहा है, “अगर औरत खाना पका सकती है तो पुरुष भी पका सकता है, क्योंकि खाना पकाने के लिए बच्चेदानी की ज़रूरत नहीं होती.”

जरूरी है नारीवाद

9. नीतू के जिम में वह एकलौती महिला है. जिम की दीवारें अनेक पोस्टरों से ढकी हुई हैं. इन पोस्टरों पर तस्वीरें हैं कसरत करते हुए शक्ति पूर्ण एवं मांसल पुरुषों की जो कि अलग-अलग मशीनों पर भारी भरकम वेट लगाकर कसरत कर रहे हैं. एक-आध पोस्टर महिलाओं के भी लगे हैं, जो या तो हंसती-खिलखिलाती हवा में कूद रही हैं, या फिर रंग-बिरंगे डम्बल्स लेकर फोटो के लिए पोज दे रही हैं. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

10. खुद को मॉडर्न दिखाने वाले लोगों से जब कुछ प्रख्यात महिलाओं का नाम पूछा जाए, तो गिनती के दो चार नाम- इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, सानिया मिर्जा- सबकी जुबां पर बैठ गए हैं. विख्यात पुरुषों के नाम की सूची थोड़ी लंबी होगी क्योंकि हर क्षेत्र से चार-पांच नाम तो सभी को कंठस्त होंगे ही. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

11. आज हर बरात में ‘ये देश है वीर जवानों का’ गाने पर जश्न मनाते हुए दुल्हे के सगे संबंधी ठुमके लगाते दिखते हैं. कई दुल्हों की शान-ओ-शौकत दिखाने के लिए हाथ में तलवार और गले में नोटों की माला भी पहनाई जाती है. वहीं दुल्हन को ‘दिन शगना दा’ जैसे भावुक गाने पर भरी सभा में एंट्री दिलाई जाती है. इसलिए ज़रूरी है नारीवादी.

12. बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड से या पति अपने पत्नी से प्यार जताने के लिए उसका बच्चे जैसा ख्याल रखते हैं. चॉकलेट, सॉफ्ट टॉय एवं फूल उपहार के रूप में देते हैं. घर में महिलाओं के लिए स्कूटी, एवं पुरुषों के लिए बाइक आती है. इसका उलटा हो जाए तो सबके लिए अजूबा हो जाता है. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

13. घर में हो या बाहर, लड़की हो या महिला, ज़रूरी है कि वह टांगें पसार के ना बैठे, शॉर्ट्स पहने हों तो पैर में रोएं ना हों, स्लीवलेस पहना हो तो बाजुएं साफ हों. उठे, बैठे, चले, खाए, बात करे, हंसे, रोए, कुछ भी करे, उसकी हर हरकत में एक नजाकत हो. ना जाने कब किस स्टॉकर की नज़र उसपर पड़ जाए तो उसका खूबसूरत लगना तो ज़रूरी है न. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.

14. ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा ‘और ‘पार्च्ड’ जैसी फ़िल्में सिनेमाघरों तक पहुंचने के लिए भी स्ट्रगल करती हैं और ‘प्यार का पंचनामा’ और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ कुछ ही दिनों में करोड़ों कमा लेती हैं. नारीवाद पर बनी बॉलीवुड फिल्मों की लिस्ट ढूंढें तो शाहरुख खान की ‘चक दे इंडिया’ और अमिताभ बच्चन की ‘पिंक’ जहां सबसे ऊपर नज़र आती हैं, वहां एक भी स्त्री केंद्रित फिल्म की कोई जगह नहीं दिखती. इसलिए ज़रूरी है नारीवाद.  

15. यह कहानियां सिर्फ एक सेजल, एक लीलावती या एक सलोनी की नहीं हैं. हर घर, हर गली, हर मोहल्ले में ना जाने कितनी कहानियां पनप रही हैं, जिन्हें आपने कभी सुना ही नहीं. भारत में लिंग अनुपात, स्त्री भ्रूण ह्त्या, घरेलु हिंसा, बलात्कार, ऑनर किलिंग, दहेज एवं डिप्रेशन के आंकड़े आसमान छू रहे हैं, और महिलाएं ज़मीन में उतने ही नीचे गड़ती जा रही हैं. महिलाएं आम इंसान हैं. अपनी अहमियत, हक और वजूद को खुद महसूस करने और सबको कराने के लिए न जाने कितनी कविताओं, लेखों, उपन्यासों, के होने के बावजूद, इस वेबसाइट में इतने कारण बयान करने की जरूरत पड़ी. इसलिए जरूरी है नारीवाद.

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