बस में बेबस

आगरा से दिल्ली आ रही बस में एक महिला को लोग घेर-घेरकर घूरते रहे, कई अन्य तरह से परेशान करते रहे, और वह बेबस दिल्ली पहुंचने का इंतज़ार करती रही. रास्ते से अपने भाई को फोन किया तो उसने कंडक्टर से बात कराने के लिए कहा. जब कंडक्टर ने कुछ भी मदद करने से इनकार किया तो दिल्ली में बैठा भाई एकदम असहाय हो गया. वह भी बस के दिल्ली पहुंचने का इंतज़ार करता रहा, बस.

कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. बार-बार बेइज्जत होती वह महिला जब दिल्ली पहुंची तो बस से उतरते ही एक बाइक गैंग ने उसे घेर लिया. उसका मोबाइल छीन लिया गया. अब वह अपने भाई से संपर्क भी नहीं कर सकती थी. अपनी लोकेशन नहीं बता सकती थी. एक राहगीर ने उसकी मदद की. अपना मोबाइल देकर भाई से संपर्क करवाया, और वह तब तक साथ खड़ा रहा जब तक कि उसका भाई वहां पहुंच नहीं गया.

पंद्रह दिन पहले ही उसकी शादी हुई थी. जिस आगरा के ताजमहल को दिखा-दिखाकर विदेशियों को हम भारत बुलाते हैं उसी शहर से उसने देश की राजधानी दिल्ली के लिए बस ली थी. मेट्रो कल्चर से वाकिफ वह महिला आत्मविश्वास से भरपूर थी. वह पहले कोलकाता में नौकरी करती थी. शादी के बाद उसने बेंगलुरु ट्रांसफर ले लिया था ताकि अपने पति के साथ रह सके.

बेंगलुरु जाने के लिए ही वह दिल्ली आ रही थी. बस में शहरी व देहाती दोनों तरह के मर्दों ने फब्तियां कसी. वे उसकी साड़ी पर भी टिप्पणी करते रहे. घूरने के अलावा उन्होंने आंखों से भद्दे इशारे भी किए. उसने जब अपने भाई को फोन किया तब भी उसका मजाक उड़ाया गया, कि किस कृष्ण को बुला रही हो. उसने मजबूर होकर बस के लोगों से ही मदद मांगी तो वे कौरवों की तरह हंसते रहे.

आए दिन महिलाओं को यह सब झेलना पड़ता है. राजधानी दिल्ली में तो महिलाओं को अक्सर पुरुष जबरदस्ती छूते भी हैं और सटने की कोशिश करते हैं. कामकाजी महिलाएं व अकेले सफ़र करने वाली महिलाओं की ज़िन्दगी का जीवन रोज़ इसी तरह गुजरता है.

इन दुर्व्यवहारों का सामना करने वाली लड़कियों व महिलाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से जो गहरी ठेस लगती है, उसके लिए कोई जिम्मेदारी क्यों नहीं उठाता? आपके गांव-शहर में महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराने के लिए आप क्या कर सकते हैं? सिर्फ स्ट्रीट लाइट लगाने, सार्वजनिक शौचालयों की व्यवस्था करने या सुनसान रास्तों पर गश्त बढ़ाने से महिलाओं की सुरक्षा नहीं हो सकती.

मान लीजिए उस बस में आपकी बहन आगरा से दिल्ली आ रही होती, और आप दिल्ली में उसका इंतज़ार कर रहे होते? अपनी बेबसी और उस बस की घटना पर क्या आप बस चुप रहते? या फिर खुद को कोस रहे होते कि आखिर क्यों आपकी बहन ने आगरा से दिल्ली की यात्रा करने के लिए खुद को इतना काबिल समझा…!

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