यादगार-ए-चकबस्त

हाल ही में मशहूर शायर पंडित बृज नरायन चकबस्त को उनकी 130 वीं पुण्य तिथि पर याद किया गया. इस अवसर पर उनकी जीवनी पर आधारित पुस्तक ‘यादगार-ए-चकबस्त’ का विमोचन इलाहाबाद स्थित उनके निवास पर किया गया.

बुद्धिजीवियों, उर्दू शायरों और साहित्यकारों ने चकबस्त को खूब याद किया. वक्ताओं ने बताया कि चकबस्त के जमाने में ही उर्दू गद्द् ने साहित्यिक माध्यम के रूप में स्थान ग्रहण करना आरम्भ किया. उन्हें शायर की हैसियत से याद करते हुए उर्दू के शिक्षकों और छात्रों ने भी उनके कलामों पर सरसरी नज़र फेरी.

चकबस्त के नाती कर्नल राजकुमार काक ने भारत बोलेगा को बताया कि उर्दू में रूचि रखने वालों की मांग रही है कि चकबस्त की रचनाएं हिन्दी लिपि में लिखी जाएं. इस सिलसिले में ‘यादगार – ए – चकबस्त’, ‘कमला’ और ‘सुब्हे वतन’ प्रकाशित किया गया है. 12 फ़रवरी को ‘यादगार – ए – चकबस्त’ का विमोचन हुआ.

कर्नल काक ने बताया कि ‘यादगार – ए – चकबस्त’ से उर्दू शायरी के शौक़ीन और चकबस्त प्रेमी दोनों ही संतुष्ट होंगे. इस पुस्तक में चकबस्त के दौर के उर्दू विद्वानों और उनके शुभचिंतकों के लेखों का अनुवाद संकलित किया गया है.

पुण्य तिथि के अवसर पर जहां चकबस्त की शायरी में भावनाओं का चित्रण किया जा रहा था, वहीं उनके कई मशहूर शेर हर किसी के जुबान पर थे. शायद चकबस्त ने ठीक ही कहा था – “किस वास्ते जुस्तजू करूं शोहरत की, एक दिन खुद ढूंढ लेगी शोहरत मुझको.”

चकबस्त (1882 – 1927) ने 9 साल की उम्र से ही शायरी शुरू कर दी थी और कुछ समय में ही उनका शुमार उच्च कोटि के शायरों में होने लगा. वतन की मुहब्बत, इजहारे ख्याल की आजादी और कौमियत की कल्पना ही चकबस्त की शायरी का पैगाम बना.

चकबस्त बीसवीं सदी के एक ऐसे महान शायर हैं जिन्होनें हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद और स्वतंत्रता संग्राम को अपनी शायरी से प्रभावित किया है. चकबस्त इकबाल के समकालीन थे.

कहना न होगा कि चकबस्त की जो शायरी है और जो मंज़रनिगारी है… हकीकत-ए-हाल को बयानही पेश कर देना… उन्हीं के वश में है.

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