फिल्म समीक्षा: सारांश

बॉलीवुड में ऐसी कम फिल्में हैं जो अपने भावपूर्ण प्रस्तुति के कारण ऑडियंस के दिलों में सदैव के लिए अमर हो जाती हैं. ऐसी ही एक फिल्म है महेश भट्ट द्वारा निर्देशित सन 1984 की फिल्म, सारांश.

सारांश फिल्म थी एक ऐसे बुज़ुर्ग दंपति की जो अपने इकलौते बेटे को खोने के बाद अपना जीवन जीने की इच्छा छोड़ देते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब उन्हें जीवन जीने का एक नया उद्देश्य मिलता है.

सारांश में बहुत से सब-प्लाट हैं और यह फिल्म बहुत से मसलों पर टिपण्णी भी करती है, जैसे कि रिश्वतखोरी, भाई भतीजावाद, अविवाहित गर्भावस्था और समाज का दोगलापन.

फिल्म के एक सीन में मुख्य नायक, प्रधान (अनुपम खेर) के दोस्त उन्हें ताना मारते हुए कहते हैं कि समाज आज भी अविवाहित महिला का गर्भवती होना स्वीकार नहीं करेगा तो इस पर प्रधान कहते हैं कि हां, और एक व्यक्ति को मार देना इस समाज के लिए स्वीकार्य है. यह फिल्म बेहद मर्मभेदी ढंग से समाज में मौजूद सभी समस्याओं पर प्राकश डालती है.

फिल्म में मुख्य किरदार निभाते दिखे अनुपम खेर, रोहिणी हट्टंगड़ी, सोनी राज़दान और मदन जैन.

हैरानी की बात यह है कि फिल्म में 60 साल के बुज़ुर्ग का किरदार निभा रहे अनुपम खेर उस वक़्त केवल 28 वर्ष के थे. यह फिल्म उनकी पहली अहम फिल्म थी और प्रधान के किरदार के लिए उनकी काफी सराहना की गई.

इस फिल्म के लिए अनुपम खेर और महेश भट्ट को सर्वश्रेष्ठ अभिनय और सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए अनेक पुरस्कार भी मिले. 

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