फिल्म समीक्षा: अर्थ

अपने  जीवन का अर्थ ढूंढने में हम इतना मशगूल हो जाते है कि जीवन को एक ढांचे में बांध कर रख लेते है और सोचते है कि जीवन उसके आलावा कुछ और है ही नहीं.

ऐसे ही पारिवारिक जीवन के अर्थ को झंझोरता साल 1982 का एक सिनेमा ‘अर्थ’ तीन लोगों के इर्द-गिर्द घूमती ऐसी कहानी कहता है जो आज भी उतनी ही ताज़ी है जितनी तब थी.

महेश भट्ट द्वारा निर्देशित यह सिनेमा कहानी है दाम्पत्य जीवन में तीसरी कड़ी जुड़ने पर आने वाली कठिनाइयों की जो सिखाती है कि कैसे समाज द्वारा बनाए हुए रिश्तो के अर्थ बदल जाते हैं जब एक तीसरी कड़ी उसमें जुड़ जाती है.

शबाना आज़मी, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल द्वारा अभिनीत यह सिनेमा न सिर्फ अपनी कहानी के लिए बल्कि अपनी ग़ज़लों के लिए भी आज तक याद किया जाता है.

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महेश भट्ट की लेखनी से पिरोया हुआ यह सिनेमा कहानी है पूजा मल्होत्रा (शबाना आज़मी) और इन्दर मल्होत्रा (कुलभूषण खरबंदा) की जो अपने दाम्पत्य जीवन में लीन होते हैं जब तक कि पूजा को उसके पति के कविता (स्मिता पाटिल) के साथ नाजायज़ सम्बन्ध का पता नहीं चलता.

कविता इन्दर के साथ रिश्ते में स्थिरता चाहती है और पूजा और इन्दर के रिश्ते को लेकर असुरक्षित रहती है, जो कि अंत तक चलता रहता है.

वहीं पूजा इन्दर से अलग हॉस्टल में रहने लगती है जहां उसकी दोस्ती राज (राज किरन) से होती है; वो दोनों अच्छे  दोस्त बन जाते हैं.

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़लों से संजोया हुआ यह सिनेमा आपको परिचित कराएगा इन तीन ज़िन्दगियों से और रिश्तों की डोर में बंधे हुए उनके नए जीवन के अर्थों से. 

जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की गज़लें, जैसे ‘झुकी झुकी सी नज़र’ और ‘तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो’ जहां आपके दिलों को छू लेंगी वहीं इस सिनेमा का हर एक किरदार आपको अपने अभिनय क्षमता और अफसानों से जोड़ कर रखेगा.

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