हथियार पर खर्च ख़त्म क्यों नहीं होते?

हथियार के चक्कर में अमेरिका और रूस संघर्ष के दलदल में उलझ गए हैं. अमेरिका एक तरफ रूस के ऊपर दंडात्मक आर्थिक प्रतिबंध बढ़ा रहा है तो रूस, दूसरी तरफ, अमेरिका के एकाधिपत्य यानी युनिपोलारिटी को चुनौती देने के लिए तत्पर है.

चीन एक बड़ी शक्ति के रूप में अंतरराष्ट्रीय फलक पर दस्तक दे चुका है. आज यह राष्ट्र आर्थिक और सैन्य शक्ति दोनों रूप से इतना सक्षम है कि अमेरिका के भी होश फाख्ता हो रहे हैं.

उत्तरी कोरिया ने अमेरिका को हिला रखा है

दक्षिण चीन सागर के विवाद में जहां एक ओर चीन और अमेरिका आस-पास के छोटे राष्ट्रों को लामबंद कर अपने-अपने कूटनीतिक दबाव को बढाने में प्रयासरत है वहीं दूसरी ओर रूस इस मुद्दे पर चीन के साथ खड़ा नज़र आ रहा है क्योंकि रूस के नजदीकी क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी रूस को भी बर्दास्त नहीं होगी.

अन्य मुद्दे पर रूस हमेशा ही चीन को अपने प्रतिद्वंदी के रूप में देखता है क्योंकि दोनों अपने-अपने आर्थिक हितों के लिए एशिया एवं विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी हैं.

दिलचस्प है कि उत्तरी कोरिया ने अमेरिका को हिला रखा है और उनके कूटनीतिज्ञों एवं विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की जान खतरे में है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बौखलाहट से साफ जाहिर है कि अमेरिका उत्तरी कोरिया के तुगलकी शासक के तुगलकी फरमानों एवं दृढ धमकियों से तह तक परेशान हैं.

एक अत्यंत छोटे से राष्ट्र के समक्ष एक ऐतिहासिक रूप से बड़ी शक्ति के इस हताशे को समझना मुश्किल हो रहा है. हकीकत यही है कि हथियारों के अपार भंडार एवं नाभकीय शस्त्रों का जखीरा भी एक बच्चा-प्रेसिडेंट के अदम्य साहस के सामने बौना साबित हो रहा है.

प्रति वर्ष हथियारों के जखीरों और रक्षा पर लगभग छ: सौ बिलियन डॉलर खर्च करने वाले सर्व-शक्तिशाली अमेरिकी राष्ट्र की इतनी तौहीन शायद इससे पहले कभी नहीं हुई होगी. दो राष्ट्रों के बीच के इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति और संपन्नता की परिभाषा को नया आयाम दे दिया है.

कहते हैं इंसान तरक्की करता हुआ हजारो वर्ष पीछे जा रहा है

अमेरिका और रूस के बाद शायद चीन ने विगत वर्षो में हथियारों का अपार भंडार इकठ्ठा किया है लेकिन वह भारत की चुनौती का जवाब पत्थरों से दे रहा है.

दक्षिण चीन सागर पर भारत, अमेरिका, वियतनाम, जापान, फिलिपिन्स, ताइवान, और अन्य यूरोपीय देशों के लामबंद होने के कारण चीन हमारे भारत के साथ इस प्रकार बदला लेने का प्रयास कर रहा है और उसकी ये समझ है कि इस दबाव के कारण भारत जल्दी ही अमेरिका से किनारा कर लेगा.

यूरोप के महत्वपूर्ण राष्ट्र यूरोपियन यूनियन की समस्याओं में उलझे हैं. इस बाबत उनके पास संघर्ष-जनित अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के लिए समय नहीं है. विश्व उनकी भूमिका से वंचित है. यूरोप के राष्ट्र भी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के शिकार हैं परंतु इसके लिए विश्व-स्तर पर कोई कड़े कदम उठाने में या तो असक्षम हो रहे हैं या फिर तेल (पेट्रोल) की राजनीति के कारण वो भी चुप हैं.

वर्तमान में भारत स्वयं को दुनिया की सबसे तेज गति से आर्थिक प्रगति करने वाला देश बताता है. पिछले कुछ वर्षो में अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी, बिजली, रोटी, कपड़ा और मकान) से बजट निकाल सुरक्षा हेतु रक्षा-बल के लिए हथियार खरीदने पर खर्च कर रहा है.

हमारी सीमाएं सुरक्षित क्यों नहीं हैं?

पहले से भी हमारी बड़ी सेना है और हथियार खरीदकर उसका आधुनिकीकरण होता रहा है. फिर भी रोज हमारे सैनिक हलाल होते रहते हैं. न पूर्ण रूप से हमारी सीमाएं सुरक्षित है न ही हमारे नागरिको को एक सम्मान-जनक जीवन जीने हेतु बुनियादी सुरक्षा मिल पा रही है. परंतु भारत अपना अंतरराष्ट्रीय  व्यक्तित्व हथियारों के बल पर बनाने को तत्पर है.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस चौराहे पर यह समझने की जरुरत है कि हथियारों के माध्यम से दो विश्व-युद्ध लड़ने के पश्चात् भी शांति कूटनीति और आपसी विचार-विमर्श से ही कायम हो पाई है. युद्ध सिर्फ विनाश और हत्याओं की इबारत लिखता रहा है. शांति, मात्र विकास और वैचारिक बहस से ही स्थापित की जा सकती है.

वर्ल्ड आर्डर को अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ एक-ध्रुवीय (युनिपोलर), तो कभी दो-ध्रुवीय (बाई-पोलर), तो कभी बहु-ध्रुवीय (मल्टी-पोलर) के रूप में परिभाषित करते हैं. परंतु समकालीन विश्व व्यवस्था का कोई आर्डर नज़र नहीं आता. सिर्फ डिसऑर्डर ही डिसऑर्डर है चाहे आप आर्थिक लेंस से देखने का प्रयास करें या राष्ट्रों के सैन्य-व्यक्तित्व के नज़रिए से.

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आलोक गुप्ता You are never too old to set another goal or dream a new dream.

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