लोकतंत्र के नाम मेरा ‘प्रॉमिस डे’

मेरा घर सामान्यतः शांत रहता है. आगंतुक बहुत कम आते हैं, और जब आते भी हैं, तो प्रायः किसी परिचित या रिश्तेदार के साथ.

इसलिए जब रात ठीक 8:20 बजे बिना किसी पूर्व सूचना के दरवाज़े की घंटी बजी, तो मुझे सहज ही समझ आ गया कि कोई सोसाइटी से ही होगा.

यह पंक्तियां मेरी आत्मप्रशंसा नहीं, बल्कि उस हकीकत का बयान हैं जिसमें मैं रहती हूं. मैं यह इसलिए साझा कर रही हूं ताकि आप समझ सकें कि जब विचार और विचारधारा की परीक्षा होती है, तो वह आपके घर के भूगोल को नहीं देखती. एक 'एलीट' सोसाइटी के बंद दरवाजों के पीछे भी कैसे एक बड़ा निर्णय लिया गया, यह उसी की शुरुआत है.
यह मेरी आत्मप्रशंसा नहीं, बल्कि उस हकीकत का बयान हैं जिसमें मैं रहती हूं. मैं यह इसलिए साझा कर रही हूं ताकि आप समझ सकें कि जब विचार और विचारधारा की परीक्षा होती है, तो वह आपके घर के भूगोल को नहीं देखती. एक ‘एलीट’ सोसाइटी के बंद दरवाजों के पीछे भी कैसे एक बड़ा निर्णय लिया गया, यह उसी की शुरुआत है.

दरवाज़ा खोलने पर मैंने एक वृद्ध व्यक्ति को देखा, जो अपने कुछ साथियों के साथ खड़े थे.

मैंने बिना किसी पूर्वाग्रह के विनम्रता से पूछा कि वे कौन हैं. उनके साथी पास के ही एक पड़ोसी से ऊंची आवाज़ में बातचीत कर रहे थे.

उन्होंने हाथ के इशारे से अपने साथियों को शांत किया और मेरी ओर मुखातिब हुए.

उन्होंने बताया कि वे आरएसएस (RSS) के कार्यकर्ता हैं और संगठन के बारे में मुझसे बात करना चाहते हैं. मेरा उत्तर किसी पूर्व विचार का परिणाम नहीं था; वह पूरी तरह स्वाभाविक था. मैंने उनसे कहा कि मैं कांग्रेस (Congress) समर्थक हूं और सबसे बढ़कर एक धर्मनिरपेक्ष भारतीय हूं.

उन्होंने मुझे देखा—स्थिर और मौन. मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया—शांतिपूर्वक, दृढ़ता से और बिना किसी कटुता के. हर असहमति संवाद की मांग नहीं करती; कुछ मौन अपने आप में ही सबसे बड़े वक्तव्य होते हैं.

कल वैलेंटाइन सप्ताह का ‘प्रॉमिस डे’ था—एक ऐसा दिन जिसे मैं प्रेम और आस्था के साथ मनाती हूं. यह लिखते हुए मुझे संतोष है कि मैंने, अपनी सीमित क्षमता में ही सही, अपने राष्ट्र से किया हुआ एक वादा निभाया.

संतोष इसलिए भी है कि इसके लिए किसी तैयारी या किसी नैतिक गणना की आवश्यकता नहीं पड़ी. मेरा उत्तर सहज रूप से आया—जैसे वे विश्वास आते हैं जो लंबे समय से मन में गहरे बसे होते हैं.

यह वह वादा है जिसे मैं अपनी अंतिम सांस तक निभाऊंगी —भारत की संकल्पना और उसके एक नागरिक के अंतःकरण के बीच बना एक अविच्छेद्य बंधन.


मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक साधारण सी शाम ऐसा मोड़ ले लेगी. मैं जिस ‘विशेषाधिकार-संपन्न’ समाज का हिस्सा हूं, वहां शांति ही नियम है. लेकिन जब उस शांति के बीच एक दस्तक हुई, तो मुझे लगा कि सच को बिना किसी पर्दे के सामने रखना जरूरी है. असहमतियों के बीच अपनी पहचान बनाए रखना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. आपको क्या लगता है—क्या हर असहमति पर बहस जरूरी है, या कभी-कभी गरिमापूर्ण मौन ही सबसे बड़ा जवाब होता है? भारत बोलेगा पर हम आपकी आवाज़ सुनना चाहते हैं. अगर आपके पास भी ऐसा कोई अनुभव है, तो हमें लिख भेजें.