दुनिया एक नए विनाशकारी युग की ओर बढ़ रही है

आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां शांति की बातें केवल किताबों तक सीमित रह गई हैं. मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जो खींचतान चल रही है, उसे किसी एक पक्ष के चश्मे से देखना अधूरा होगा. यह संघर्ष शक्ति, सुरक्षा और सिद्धांतों का एक ऐसा उलझा हुआ जाल है जिसे समझना हर नागरिक के लिए जरूरी है.

शक्ति और सुरक्षा का तर्क

एक तरफ अमेरिका और इजरायल का पक्ष है. उनका तर्क है कि अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आतंकवाद का खात्मा उनके लिए सर्वोपरि है. वे इसे ‘न्यायपूर्ण युद्ध’ का नाम देते हैं. लेकिन, जब सुरक्षा के नाम पर हजारों मासूम बच्चों की जानें जाने लगती हैं और पूरे के पूरे शहर मलबे में तब्दील हो जाते हैं, तब दुनिया के सामने सवाल उठता है—क्या सुरक्षा की कोई नैतिक सीमा नहीं होती? क्या ताकतवर होना किसी को भी जवाबदेही से मुक्त कर देता है?

प्रतिरोध और शहादत की परंपरा

दूसरी ओर ईरान और उसके सहयोगी खड़े हैं. इनके लिए यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा बचाने की जंग नहीं है, बल्कि ‘प्रतिरोध’ (Resistance) की एक लंबी विरासत है. ईरान के राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व, विशेषकर शिया विचारधारा में, अन्याय के खिलाफ खड़े होने को ‘कर्बला’ की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है. उनके लिए समर्पण करना नैतिक मृत्यु के समान है. यही कारण है कि भारी प्रतिबंधों और हमलों के बावजूद वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.

महाशक्तियों की बिसात: रूस और चीन की भूमिका

इस पूरे खेल में रूस और चीन की भूमिका ‘खामोश लेकिन गहरी’ है. वे सीधे युद्ध में नहीं उतरे हैं, लेकिन ईरान को तकनीकी और रक्षा सहयोग देकर उन्होंने अमेरिका की राह मुश्किल कर दी है. यह लड़ाई दरअसल भविष्य के ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ की है—क्या दुनिया पर केवल अमेरिका का हुक्म चलेगा, या रूस-चीन के साथ एक नया शक्ति केंद्र बनेगा? ईरान इस शतरंज की बिसात का वह मोहरा है जिसे गिराने के लिए अमेरिका पूरी ताकत लगा रहा है.

ईरान एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने ही शासन द्वारा बंधक बना हुआ है.
ईरान में रह रहे एक व्यक्ति ने अपने देश की मौजूदा स्थिति संक्षेप में कुछ तरह बयां की है: “ईरान एक ऐसा राष्ट्र है जो अपने ही शासन द्वारा बंधक बना हुआ है, लेकिन अपने पड़ोसियों के हश्र से त्रस्त है. हम एक ऐसे घर में फंसे हुए हैं जिससे हम नफरत करते हैं, और चारों ओर ऐसी आग से घिरे हुए हैं जिससे हम और भी अधिक भयभीत होते हैं.”

आम आदमी पर असर

भारत जैसे देशों के लिए यह केवल विदेशी खबर नहीं है. अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है या इसमें तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा. युद्ध लड़ते नेता हैं, लेकिन इसकी कीमत दुनिया का आम गरीब आदमी चुकाता है.

‘परमाणु युद्ध’ की संभावना

इधर-उधर देखें तो आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच का तनाव केवल एक क्षेत्रीय झगड़ा नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक गंभीर संकट बन गया है.

सबसे बड़ा खतरा है ‘परमाणु युद्ध’ की संभावना. यदि यह संघर्ष बढ़ता है, तो संयम की सीमाएं टूट सकती हैं, जिसका परिणाम पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी होगा. दूसरा पहलू है वैश्विक अर्थव्यवस्था.

इसके अलावा, यह संघर्ष नैतिक पतन का प्रतीक बनता जा रहा है. जब शक्तिशाली राष्ट्र ‘सुरक्षा’ के नाम पर आम नागरिकों और बच्चों की मौत को जायज ठहराने लगते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों की प्रासंगिकता खत्म होने लगती है. यह युद्ध हमें एक ऐसी दुनिया की ओर धकेल रहा है जहां ‘शक्ति ही सत्य है’ (Might is Right).

शांतिपूर्ण दुनिया के लिए यह जरूरी है कि हम हिंसा के इस सामान्यीकरण को रोकें, वरना आने वाली नस्लें हमें केवल विनाश के मलबे के लिए याद रखेंगी.

यह लड़ाई कब तक चलेगी और क्या यह और बढ़ेगी

यह कोई दो-चार दिन की मामूली झड़प नहीं है. फरवरी के आखिरी दिनों में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) शुरू किया है, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत की खबरें आई हैं.

अमेरिका का मकसद सिर्फ हमला करना नहीं, बल्कि ईरान की सत्ता को पूरी तरह बदलना है. इसलिए, जब तक ईरान में कोई बड़ा नेतृत्व परिवर्तन नहीं होता या ईरान पूरी तरह आत्मसमर्पण नहीं करता, यह खींचती रहेगी.

इस मामले पर अपनी निगाहें जमाये चिंतक-लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी कहते हैं – “सत्ता पलटो नहीं तो युद्ध करेंगे. यह है अमेरिका का नया नारा. धमकी के आगे झुको नहीं तो हमले करेंगे. अमेरिका किस तरह लोकतंत्र स्थापित करता है इसे इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान देखकर समझ सकते हैं.”

प्रो चतुर्वेदी का यह भी कहना है कि अकारण शुरू हुए इस युद्ध का लक्ष्य है साम्राज्यवादी विस्तारवाद. “भारत नहीं बोला तो भविष्य में पाक के जरिये अमेरिका कभी भी भारत पर युद्ध थोप सकता है. ईरान की संप्रभुता खतरे में है. भारत को तुरंत हस्तक्षेप करके युद्ध रोकने का प्रयत्न करना चाहिए. यह युद्ध जारी रहता है तो लाखों भारतीय नागरिकों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है, और भारत आने वाले अरबों रुपए आने बंद हो जाएंगे.”

क्या चीन और रूस इस युद्ध में कूदेंगे?

फिलहाल रूस और चीन खुद सीधे मैदान में नहीं उतरे हैं, लेकिन उनके ईरान के ‘पर्दे के पीछे के मददगार’ (Technological Anchors) बने रहने के संकेत हैं. वहीं, रूस खुद भी यूक्रेन की जंग में फंसा है, और चीन अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिका के साथ सीधे युद्ध में झोंकना नहीं चाहता. इसलिए, वे ईरान को हथियार और तकनीक तो देंगे, लेकिन अपनी सेना शायद ही भेजें. हालांकि, अगर ईरान पूरी तरह ढहने लगा, तो वे इसे रोकने के लिए कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं क्योंकि ईरान का गिरना उनके लिए बड़ा झटका होगा.

दुनियाभर के विशेषज्ञों की राय जानकार कोई निचोड़ निकालें तो कहा जा सकता है कि यह लड़ाई सिर्फ इजरायल-ईरान की नहीं, बल्कि दुनिया के बॉस बनने की लड़ाई है. अमेरिका चाहता है कि वह मिडिल ईस्ट से रूस-चीन का प्रभाव खत्म कर दे. आम जनता के लिए खतरा यह है कि अगर यह लंबी चली, तो पूरी दुनिया में तेल और अनाज इतना महंगा हो जाएगा कि गरीब की थाली से रोटी कम हो जाएगी.

भारतीय दृष्टिकोण: संतुलन की कठिन डगर

इस वैश्विक महासंग्राम के बीच भारत की स्थिति ‘दो पाटों के बीच’ जैसी है. एक तरफ भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंध हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान हमारा ऐतिहासिक मित्र और ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) का एक प्रमुख जरिया रहा है. भारत के लिए यह केवल कूटनीति का सवाल नहीं है, बल्कि देश के आर्थिक हितों और लाखों भारतीयों की सुरक्षा का मामला है. मध्य-पूर्व (Middle East) में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं, जिनके रोजगार और सुरक्षा पर इस युद्ध का सीधा साया मंडरा रहा है.

भारत का मानना है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. यदि ईरान में अस्थिरता बढ़ती है, तो भारत के ‘चाबहार बंदरगाह’ (Chabahar Port ) और ‘उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (INSTC) जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स अधर में लटक सकते हैं, जो मध्य एशिया तक हमारे व्यापार का मुख्य रास्ता हैं. इसके अलावा, कच्चा तेल महंगा होने से भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, जिससे घरेलू बाजार में सामान की कीमतें बढ़ेंगी.