लखनऊ को दुनिया की सबसे महान मुस्लिम संस्कृति वाली नगरी माना जाता है. लेकिन क्या हिंदू संस्कृति इसमें परंपरागत रूप से इतनी खूबसूरती से घुली-मिली नहीं है, जिसे हमारे हिंदी फिल्मों में बार-बार चित्रित किया गया है?
लखनऊ की बोली, नवाबी ठाठ, आचरण, शिष्टाचार, शारीरिक भाषा—ये सब बॉलीवुड ने वर्षों से जीवंत रूप से अपनाया है. याद कीजिए राजकुमार को ‘मेरे हुजूर’ (1968) में, जो लखनऊ में ही शूट हुई थी. इसमें वे पूरे जोश में कहते हैं, “कौन से ऐसे शहर में कौन सी ऐसी फिर्दौस है जिसे हम नहीं जानते!”
फिर ‘पालकी’ (1967) का ओपनिंग सांग मोहम्मद रफ़ी द्वारा राजेंद्र कुमार के लिए गाया गया—’ऐ शहर-ए-लखनऊ तुझे मेरा सलाम है.’ और यह कौन नहीं जानता कि गुरु दत्त ने ‘चौदहवीं का चांद’ (1960) लखनऊ में ही शूट की थी. हम आपको याद दिला दें कि फिल्म का एक गीत कम से कम पांच बार लखनऊ की प्रशंसा में शुरू होता है—’ये लखनऊ की सरज़मीं, ये रंग-रूप का चमन, ये हुस्न-ओ-इश्क का वतन, यही तो वो मक़ाम है.’
शकील बदायुनी के ये बोल, जो खुद शहर से गहराई से जुड़े थे, इन शब्दों पर समाप्त होते हैं: ‘निभाए अपनी शान भी, बढ़ाए दिल की शान भी, हैं ऐसे मेहरबान भी… ये लखनऊ की सरज़मीं.’

लखनऊ मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर अनीस, मिर्ज़ा दबीर, बेगम अख्तर, नौशाद अली, तलत महमूद, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी, सुधीर मिश्रा, अमृतलाल नागर, अमिताभ भट्टाचार्य, वजाहत मिर्ज़ा, बिरजू महाराज, नादिरा बब्बर, मीर तकी मीर और अतुल तिवारी जैसों का शहर रहा है.
आपको पता है न कि आगा ने ‘संसार’ (1951) में क्या कहा —’लखनऊ चलो अब रानी, बंबई का बिगड़ा पानी’, जिसे गीतादत्त और जी.एम. दुर्रानी ने गाया. चलिए ये आपने भले ही न सुना हो, लेकिन आपको यह बताना हमारा फ़र्ज़ है कि आईआईएम लखनऊ के छात्र भी बॉलीवुड से सबक लेते रहे हैं.
सचमुच, लखनऊ ने परंपरागत रूप से बॉलीवुड फिल्मों को विभिन्न तरीकों से प्रभावित किया है—चाहे शूटिंग हो, पटकथा लेखन या कहानी की पृष्ठभूमि.
हिंदी फिल्म उद्योग पर लखनऊ के प्रमुख प्रभाव का प्रमाण यह है कि ‘पाकीज़ा’ (1972) का गीत ‘चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो’ गोमती नदी के किनारे शूट हुआ. उसी साल मीना कुमारी अभिनीत फिल्म ‘गोमती के किनारे’ भी आई.
मुज़फ्फर अली, जो लखनऊवासी ही हैं, ने हिंदी सिनेमा की सबसे प्रसिद्ध फिल्मों में से एक—’उमराव जान’ (1981)—इसी शहर में चित्रित की. सत्यजीत राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (1977) भी लखनऊ में शूट हुई.
मज़ेदार बात यह है कि कभी-कभी लखनऊ का इस्तेमाल पाकिस्तान के कुछ शहरों को दिखाने के लिए भी हुआ, जैसे ‘गदर: एक प्रेम कथा’ में. शहर में अन्य उल्लेखनीय शूटिंग भी हुईं जैसे अशोक कुमार की ‘नज़मा’ (1943), राजेंद्र कुमार और साधना की ‘मेरे महबूब’ (1963) और ‘अनवर’ (2007) के लिए.
क्या आप लखनऊ से हैं? या शहर की नवाबी ठाठ ने आपको कहीं छुआ है? अपनी कहानी शेयर कीजिए कमेंट्स में—कोई बॉलीवुड गाना याद आ रहा हो या कोई फिल्म का सीन. शेयर करके दोस्तों को लखनऊ का जादू दिखाइए.
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