स्मार्ट सिटी का नारा है, या मौत का खुला पिटारा है; फाइलों में चमक है साहिब, पर ज़मीन पर सड़ांध गहरा है.

दिल्ली के एक मोहल्ले का वीडियो आजकल सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है. लेकिन यकीन मानिए, यह सिर्फ दिल्ली की नहीं, बल्कि भारत के लगभग हर छोटे-बड़े शहर की सिसकती हुई कहानी है. जिस वीडियो की चर्चा हो रही है, उसे यूट्यूबर शरद शर्मा ने अपने चैनल पर दिखाया. इसमें दिल्ली के किराड़ी इलाके के ‘मुबारकपुर डबास’ और ‘शर्मा एन्क्लेव’ की वो भयावह तस्वीरें हैं, जिन्हें शरद शर्मा ने नेशनल हेडलाइन बना दिया.
यह घटना जनवरी की है. आप सोच रहे होंगे कि अब वहां के क्या हाल हैं? आपको वहां जाने की जरूरत नहीं है. बस अपने घर से कुछ दूर टहलने निकल जाइए, कमोवेश वही नजारा आपके आसपास भी दिख जाएगा. इन सबके बीच जो सबसे बड़ा ‘चूना’ देश की जनता को लगाया गया है, वह है—स्मार्ट सिटी का कॉन्सेप्ट. स्मार्ट सिटी बोल-बोलकर कई शहरों को सब्जबाग दिखाए गए, और अंत में हुआ वही—सड़क पर सड़ांध और सिस्टम में अंधेरगर्दी.

नेताओं का ‘ब्लेम गेम’ और मरती जनता
शरद शर्मा के वीडियो के बाद मीडिया और राजनीतिक दलों में होड़ मच गई. आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, मानो किसी ने भारत के नहीं बल्कि किसी दुश्मन देश के गांव की फुटेज दिखा दी हो. आज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के दौर में लोग वीडियो देखकर भी उसे ‘फेक’ बताने लगते हैं, जो कि सबसे बड़ा दुर्भाग्य है.
इस मुद्दे पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तीखा हमला करते हुए कहा कि, “हर आम भारतीय की जिंदगी आज ऐसी ही नरक की यातना बन गई है. सिस्टम सत्ता के सामने बिक चुका है. सब एक-दूसरे की पीठ थपथपाते हैं और मिलकर जनता को रौंदते हैं. शहरी सड़न इस लालच की महामारी का सबसे डरावना चेहरा है.” उन्होंने जनता से अपील की कि वे जवाबदेही मांगें, वरना यह सड़न हर दरवाजे तक पहुंचेगी.
सिस्टम की लापरवाही: जब गड्ढे बन जाते हैं ‘मौत का कुआं’
यह सड़न केवल गंदगी तक सीमित नहीं है, यह अब जानलेवा हो चुकी है. अभी हाल ही में नोएडा और दिल्ली में ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने रोंगटे खड़े कर दिए.
- नोएडा: निर्माणाधीन सड़कों और खुले पड़े गहरे गड्ढों के कारण बाइक सवारों और राहगीरों की जान गई. प्रशासन ने गड्ढा खोदकर छोड़ दिया, न वहां कोई बैरिकेडिंग थी और न ही लाइट.
- दिल्ली: जलभराव और खुले नालों में गिरकर हाल के महीनों में मासूम बच्चों और वयस्कों की मौत की खबरें आईं.
क्या इन मौतों की जिम्मेदारी किसी की नहीं है? क्या प्रशासन केवल टैक्स वसूलने के लिए है?
स्वच्छता का ‘इंदौर मॉडल’ और दावों की हकीकत
जब हम सफाई की बात करते हैं, तो अक्सर स्वच्छ सर्वेक्षण के आंकड़ों को ढाल बनाया जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश का इंदौर लगातार पांच-छह बार से भारत का सबसे स्वच्छ शहर बना. लेकिन कागजी सफाई और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरा गड्ढा है.
आंकड़ों में शहर ‘नंबर वन’, पर नलों में जहर—कैसा है ये दिखावे का शहर?
हाल ही में इंदौर से आई खबरों ने सबको झकझोर दिया, जहां दूषित पानी पीने की वजह से कई मासूमों की मौत हो गई. अब यह तो इंदौर की जनता ही बेहतर बता सकती है कि ‘नंबर वन’ के तमगे के पीछे उन्हें पीने के लिए जो पानी मिल रहा है, वह अमृत है या जहर. क्या स्वच्छता केवल सड़कों की झाड़ू तक सीमित है? क्या नलों से आने वाला गंदा पानी स्मार्ट सिटी की परिभाषा में नहीं आता?

बिहार: ‘सुशासन’ के दावों के बीच गंदगी का अंबार
यही हाल बिहार का भी है. स्वच्छता सर्वेक्षण में 10 लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों में पटना को सबसे गंदा शहर माना गया. यह उस प्रदेश की राजधानी है जहां नीतीश कुमार सालों से ‘सुशासन’ का झंडा बुलंद कर रहे हैं. विडंबना देखिए, 10 लाख से कम आबादी वाले देश के सबसे गंदे टॉप-10 शहरों में से 6 अकेले बिहार के हैं. हद तो तब हो गई जब खुद बिहार के नगर विकास मंत्री का अपना शहर जलमग्न हो गया और वे खुद लाचार दिखे. जब सिस्टम के कर्ता-धर्ता ही जलभराव और गंदगी की भेंट चढ़ जाएं, तो आम आदमी की बिसात ही क्या है?
सियासी खींचतान में फंसा आम आदमी
दिल्ली की स्थिति पर सोशल मीडिया अकाउंट ‘मटियामेट’ ने सटीक टिप्पणी की— “यह 21वीं सदी है, यहां एक-दूसरे पर उंगली उठाकर अपनी कमियां तो छुपाई जा सकती हैं, लेकिन अपनी गलतियां कोई मानने को तैयार नहीं है.”
बीजेपी और ‘आप’ के बीच चल रहे युद्ध में जनता पिस रही है. बीजेपी का आरोप है कि 11 साल की ‘आप’ सरकार ने दिल्ली को नरक बना दिया, वहीं आम आदमी पार्टी का तर्क है कि फंड और एमसीडी के बजट का सही इस्तेमाल नहीं होने दिया जा रहा. दिल्ली में सीवेज के लिए एमसीडी का बजट 4,795.28 करोड़ रुपये है. सवाल यह है कि यह भारी-भरकम पैसा जा कहां रहा है?

निष्कर्ष: आपके इलाके का हिसाब कौन देगा?
दिल्ली को लेकर आरोप लगाना आसान है, लेकिन क्या आपने अपने इलाके में झांककर देखा है? टूटी सड़कें, खुले नाले, धूल, कूड़ा, जाम और दमघोंटू प्रदूषण—यही आज के ‘न्यू इंडिया’ के शहरों की पहचान बन गई है.
नेताओं को पहले ‘ब्लेम गेम’ खेल लेने दीजिए, उसके बाद शायद वे आपके काम के बारे में सोचें. तब तक, सावधान रहिए, क्योंकि आपके शहर का अगला गड्ढा शायद किसी प्रशासनिक ‘स्मार्टनेस’ का ही नतीजा हो.
क्या आपके शहर में भी ऐसी ही बदहाली है? हमें कमेंट में बताएं और अपनी आवाज बुलंद करें. अगर आज आपने कुछ नहीं कहा, तो कल गंदे पानी और खुले गड्ढे की बारी आपके इलाके-दरवाजे की होगी.
केवल मूकदर्शक नहीं