जानें ‘मुफ्त’ इंटरनेट की असली कीमत

मोबाइल फोन अब केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि शरीर के किसी अंग की तरह अनिवार्य हो गया है — मानते हैं न!

अमीर हो या गरीब, शहर हो या गांव —समाज के हर वर्ग के हाथों में स्मार्टफोन है. हम हर क्लिक, हर सर्च और हर ऑनलाइन लेन-देन के साथ साइबरस्पेस में अपने पदचिह्न (Digital Footprints) छोड़ रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस ‘मुफ्त’ इंटरनेट की असली कीमत क्या है?

सोचिए – क्या आप सुरक्षित हैं?

तकनीक जितनी उन्नत हुई है, हमारी निजता (Privacy) उतनी ही असुरक्षित. बड़ी टेक कंपनियां (Big Tech) सुरक्षा के नाम पर हमारे डेटा का अंबार लगा रही हैं. यह डेटा केवल विज्ञापन दिखाने के लिए नहीं, बल्कि हमारी आदतों, हमारी सोच और हमारे व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जा रहा है. जब डेटा का संग्रह बिना किसी जवाबदेही के होता है, तो वह सीधे हमारी ‘डिजिटल गरिमा‘ (Digital Dignity) पर प्रहार करता है.

अदृश्य बोझ: हमें लगता है कि इंटरनेट ‘फ्री’ है, लेकिन असल में हम अपनी जानकारी से इसकी भारी कीमत चुका रहे हैं. यह अनियंत्रित डेटा संग्रह न केवल हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बुरा असर डाल रहा है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर रहा है.

जिस दिन आपकी डिजिटल गरिमा से समझौता होता है, उस दिन आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ जाती है

साइबर अपराध का नया चेहरा तो आपने देखा ही है

हम डिजिटल अरेस्ट के खौफ की ही बात कर रहे हैं. भारत में हाल के दिनों में साइबर अपराधों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. इनमें सबसे खतरनाक और भयावह रूप ‘डिजिटल अरेस्ट‘ (Digital Arrest) के रूप में सामने आया है. अपराधी खुद को पुलिस या सरकारी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल के जरिए लोगों को उनके घरों में ही ‘कैद’ कर लेते हैं और भारी वसूली करते हैं.

यह कैसे संभव है? पहले यह सोचा भी जा सकता था? आने वाले समय अब क्या-क्या देखना पड़ेगा!

प्रशासनिक और राजनीतिक अनभिज्ञता: एक बड़ी चुनौती

विडंबना यह है कि जहां अपराधी तकनीक के मामले में कोसों आगे निकल चुके हैं, वहीं हमारी सरकारी एजेंसियां और जांच दल इस डिजिटल चक्रव्यूह को समझने में अब भी पीछे नजर आते हैं. डेटा चोरी हो या डिजिटल अरेस्ट, अक्सर प्रशासन का रवैया सुस्त और अप्रभावी दिखाई देता है. सबसे चिंताजनक पहलू तो यह है कि हमारे देश के वरिष्ठ अधिकारी और नीति-निर्धारक (Politicians), जो देश की सुरक्षा के लिए कानून बनाते हैं, स्वयं इस डिजिटल युग की बारीकियों से अनजान लगते हैं. जब ऊंचे पदों पर बैठे लोग अपने स्वयं के डेटा और सोशल मीडिया खातों को सुरक्षित रखने में ‘नौसिखिए’ साबित होते हैं, तो एक आम नागरिक की सुरक्षा भगवान भरोसे ही नजर आती है. यह तकनीकी अज्ञानता ही है जो अपराधियों के हौसले बुलंद करती है और डिजिटल इंडिया के सपनों के आगे सुरक्षा की एक बड़ी दीवार खड़ी कर देती है.

समझें और समझाएं कि यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि व्यक्ति की मानसिक स्वतंत्रता और उसकी डिजिटल सुरक्षा पर सबसे बड़ा हमला है. यह इस बात का प्रमाण है कि कैसे असुरक्षित साइबरस्पेस हमारी मौलिक स्वतंत्रता को कुचल रहा है. दरअसल, निगरानी का यह मॉडल जिसे सुरक्षा के नाम पर जायज ठहराया जाता है, धीरे-धीरे हमारे भरोसे और नवाचार (Innovation) को खत्म कर रहा है.

स्पैम की बाढ़ और सर्विस प्रोवाइडर्स की संदिग्ध भूमिका

डिजिटल असुरक्षा का एक और परेशान करने वाला पहलू है—दिन भर आने वाली अनचाही स्पैम कॉल्स और मैसेजेस की बाढ़. सवाल यह है कि आपका नंबर इन मार्केटिंग कंपनियों और फ्रॉड करने वालों के पास पहुंचता कैसे है?

यहां फ़ोन सर्विस ऑपरेटर्स (Telecom Operators) की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि मुनाफ़े की होड़ में उपभोक्ताओं के निजी डेटा का सौदा किया जा रहा है. सर्विस प्रोवाइडर्स की यह ढुलमुल नीति और निगरानी की कमी ही अपराधियों के लिए ‘कच्चा माल’ मुहैया कराती है.

जब हमारी टेलीकॉम कंपनियां ही हमारे डेटा की पहरेदार बनने के बजाय उसकी लीकेज का जरिया बन जाएं, तो सुरक्षा की उम्मीद किससे की जाए?

बैंकिंग प्रणाली: सुरक्षा कवच या अपराधियों का खुला द्वार?

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल हमारी बैंकिंग प्रणाली पर खड़ा होता है. आखिर सारा लेन-देन, सारी वसूली और सारा डिजिटल खेल बैंकों के जरिए ही तो संपन्न होता है!

आज जब बैंकिंग पूरी तरह ऑनलाइन हो चुकी है, तब बैंकों की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे सुरक्षा की ऐसी अभेद्य दीवार खड़ी करें जिसे कोई सेंध न लगा सके. लेकिन हकीकत इसके उलट है.

संदिग्ध लेन-देन और केवाईसी (KYC) के नाम पर आम आदमी को परेशान करने वाले बैंक, अपराधियों द्वारा पलक झपकते ही उड़ाए गए लाखों-करोड़ों रुपयों के सामने लाचार नजर आते हैं.

क्या बैंकों की तकनीक इतनी कमजोर है कि वे ‘सस्पेक्टेड’ खातों और फ्रॉड ट्रांजेक्शन को समय रहते पकड़ भी नहीं पाते? जब तक बैंक अपनी डिजिटल तिजोरियों को अपराधियों से ज्यादा चालाक नहीं बनाएंगे, तब तक आम नागरिक की मेहनत की कमाई इस डिजिटल समंदर में डूबती ही रहेगी.

डेटा आपकी शक्ति है, उनका व्यापार नहीं

अक्सर कहा जाता था कि डेटा ‘नया तेल’ (New Oil) है, लेकिन हकीकत में यह आपकी पहचान है. जब बिग टेक और अनियंत्रित डिजिटल सर्विलांस हमारे निजी जीवन में झांकते हैं, तो वे केवल डेटा चोरी नहीं करते, बल्कि लोकतंत्र और हमारे भरोसे को भी कमजोर करते हैं. दुर्भाग्यवश, मुख्यधारा की मीडिया भी अक्सर इन तकनीकी खतरों की गहराई को समझाने में विफल रहती है, जिससे जनता इन जोखिमों से अनजान रह जाती है.

अपनी डिजिटल गरिमा के लिए आवाज़ उठाएं

अपनी जो भी जानकारी है, उस पर आपका नियंत्रण होना ही चाहिए. बिना किसी डर या निगरानी के डिजिटल माध्यमों का उपयोग करना आपका अधिकार होना चाहिए. तमाम साइबर साक्षरता के बावजूद आखिर क्यों और कैसे डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड हो रहे हैं—इसका एक बड़ा कारण हमारी ‘डिजिटल और मीडिया साक्षरता’ की कमी है. इसके लिए हर मंच से आवाज़ उठनी चाहिए. ऐसा करने से ही आपकी डिजिटल स्वतंत्रता वापस आ सकती है.

सुरक्षा के मंत्र: गांठ बांध लें

  • डिजिटल अरेस्ट से बचें: याद रखें, कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी (Arrest) नहीं करती और न ही पैसे मांगती है. ऐसा कॉल आते ही तुरंत काट दें.
  • अज्ञात लिंक पर क्लिक न करें: किसी भी लुभावने ऑफर या धमकी भरे SMS वाले लिंक को न छुएं.
  • परमिशन चेक: ऐप्स को केवल वही एक्सेस दें जो बहुत जरूरी हो.

अब समय आ गया है कि हम केवल तकनीक के उपभोक्ता न बनें, बल्कि अपने डिजिटल अधिकारों के प्रति जागरूक नागरिक बनें. डेटा गवर्नेंस के जरिये सख्त कानूनों की मांग करें और सरकार को बाध्य करें जिससे डेटा सुरक्षा को मानवाधिकार की तरह देखा जाए. हमें उन विकेंद्रीकृत (Decentralized) और प्राइवेसी-केंद्रित विकल्पों को बढ़ावा देना होगा जो हमारी गरिमा का सम्मान करते हैं.

अपने स्तर पर उन ऐप्स और टूल्स का चुनाव करें जो एन्क्रिप्शन और प्राइवेसी को प्राथमिकता देते हैं. साथ ही, डिजिटल अरेस्ट या डेटा चोरी जैसे खतरों के प्रति खुद के साथ अपने परिवार-सम्बन्धी-सहयोगियों-पड़ोसियों को शिक्षित करें.

फिर देखिये आपका हर क्लिक आपकी कहानी कहेगा. याद रखें, जिस दिन आपकी डिजिटल गरिमा से समझौता होता है, उस दिन आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ जाती है. भारत बोलेगा का आह्वान है—अपनी डिजिटल दुनिया के खुद मालिक बनें, किसी एल्गोरिदम की कठपुतली नहीं.

खुद को सुरक्षित करें.


अस्वीकरण: इस लेख का उद्देश्य डिजिटल सुरक्षा और व्यक्तिगत डेटा के प्रति जागरूकता फैलाना है. दी गई जानकारी सामान्य शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है. किसी भी संदिग्ध साइबर गतिविधि या वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में, तुरंत अपने बैंक को सूचित करें और आधिकारिक सरकारी पोर्टल या हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें. तकनीकी टूल्स और ऐप्स का चुनाव विवेकपूर्ण तरीके से करें. ध्यान रहे, आप बोलेंगे तो भारत बोलेगा.