दो रुपये की खुशी क्या ही हो सकती है – 4 फरवरी 2026, शब-ए-बारात की छुट्टी का दिन था.
मैं पटना के बाहर हाईवे के किनारे अपने एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था. सर्दी की हल्की धूप थी और आस-पास की दुकानों में रौनक़ छाई हुई थी. तभी मेरी नज़र बगल में एक छोटी सी गुमटी के पास खेलते हुए पांच बच्चों पर पड़ी. सभी स्कूल की वर्दी में थे, उम्र रही होगी कोई सात-आठ साल.
मुझे बच्चों से बातें करना हमेशा से अच्छा लगता रहा है. मैं उनके पास गया और पूछा, “बेटा, तुम लोग कहां पढ़ते हो?”
उनमें से एक बच्चे ने अपनी भोजपुरी में कहा, “इहे बगल में एगो सरकारी स्कूल बा, उहए में जानी.”

मुझे सुनकर अच्छा लगा कि ये बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. फिर मैंने सोचा, क्यों न इनकी पढ़ाई की थोड़ी परख कर लूं. मैंने पूछा, “पहाड़ा (टेबल) कितना तक आता है?”
“दस ले आवत है,” सबने एक साथ गर्व से कहा.
मुझे हैरानी हुई. आजकल के कई शहरी बच्चे सात तक का पहाड़ा भी नहीं सुना पाते. मैंने तुरंत कहा, “अच्छा, तो कोई मुझे नौ का पहाड़ा सुनाओ.”
बच्चे आपस में कहने लगे, “तू सुना… नहीं तू सुना…”
फिर उनमें से एक बच्चे ने प्यार से, बिना किसी झिझक के, नौ का पूरा पहाड़ा धाराप्रवाह सुना दिया. मैं प्रभावित हो गया.
“बेटा, तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है?” मैंने पूछा.
“सुरेश मोची,” उसने सहजता से कहा.
उस पल मेरे मन में एक अजीब सी प्रसन्नता और सम्मान का भाव उमड़ आया. ये बच्चे, जिनके पास शायद वो सुविधाएं नहीं थीं जो शहर के महंगे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पास होती हैं, फिर भी इनका ज्ञान और आत्मविश्वास कितना मज़बूत था.
मैं बगल की गुमटी पर गया और दुकानदार से पांच लॉलीपॉप खरीदे, दो-दो रुपये के. मैंने उन सभी बच्चों को एक-एक लॉलीपॉप दिया. बच्चों के चेहरे खुशी से चमक उठे.
मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन पांच बच्चों में से एक की ही वह गुमटी थी.
मैं अपनी गाड़ी में बैठ गया और दोस्त के साथ निकलने की तैयारी करने लगा. तभी अचानक मैंने देखा कि उस दुकानदार के बेटे ने वह लॉलीपॉप वापस दुकान में रख दिया. उसकी आवाज़ मेरे कानों में आई, “देख, हमार दू रुपइया हो गइल.”
उस पल मेरी गाड़ी तो आगे बढ़ गई, लेकिन मेरा मन वहीं ठहर गया.
एक सात-आठ साल का बच्चा, जिसे किसी ने मुफ़्त में लॉलीपॉप दिया था, वह उसे अपने परिवार की दुकान में बिकने के लिए रख रहा था. उसे पता था कि वह दो रुपये उसके पिता की मेहनत की कमाई में जुड़ जाएंगे. उसे पता था कि हर रुपये की क़ीमत क्या होती है.
मैं सोचने लगा — गरीबी एक अभिशाप है, लेकिन यह बच्चों को ज़िम्मेदारी और समझदारी भी सिखा देती है. जब घर में पैसे की तंगी होती है, तो बच्चे अपने आप समझ जाते हैं कि हर चीज़ की एक क़ीमत है, हर मेहनत का एक मोल है. और दूसरी तरफ़ आज के वे बच्चे हैं, जिनके पास सब कुछ है — महंगे खिलौने, स्मार्टफोन, ब्रांडेड कपड़े — लेकिन उन्हें न परिश्रम का मोल पता है, न पैसे की क़द्र. उन्हें यह नहीं पता कि पिता सुबह से शाम तक कितनी मेहनत करते हैं ताकि उनकी हर ज़िद पूरी हो सके.
शिक्षा सिर्फ़ किताबों से नहीं मिलती, परिस्थितियां भी सिखाती हैं. वह छोटा बच्चा मुझे यह याद दिला गया कि असली शिक्षा वह है जो इंसान को ज़िम्मेदार, संवेदनशील और समझदार बनाए. महंगे स्कूल डिग्री दे सकते हैं, लेकिन जीवन के असली पाठ तो संघर्ष और परिस्थितियां सिखाती हैं.
उस दिन हाईवे के किनारे मिले उन पांच बच्चों ने मुझे एक गहरा सबक़ दिया. उन्होंने मुझे बताया कि प्रतिभा किसी वर्ग या वर्ग-विशेष की मोहताज नहीं होती. ज़रूरत सिर्फ़ अवसर और प्रोत्साहन की होती है.
और सबसे बड़ी बात — दो रुपये में भी खुशी हो सकती है, अगर उसमें अपनों के लिए योगदान की भावना हो.
उस बच्चे की वह मासूम सी मुस्कान और यह कहना कि “देखो, हमार दू रुपइया हो गइल” मुझे हमेशा याद दिलाती रहेगी कि असली संपन्नता, असली ख़ुशी मन की होती है, जेब की नहीं.
- गगन भारद्वाज | पटना
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