कल्पना कीजिए कि आप एक ख़ज़ाना खोजने वाले यात्री हैं—जिसने समुद्र के उग्र तूफ़ानों को झेला है, क्रोधित लहरों से संघर्ष किया है, और उन पहाड़ जैसी उठती लहरों को देखा है जिनके सामने नाव भी बौनी लगने लगे. और अंततः आप एक सफ़ेद रेतीले तट पर पहुंचते हैं, जहां पानी कांच की तरह पारदर्शी है. कांपते हाथों से आप उस विशाल संदूक को खोलते हैं, जिसमें सोना, चांदी या रत्न छिपे होने की उम्मीद है. भीतर रेत, सीपियां, कुछ साधारण-से केकड़े—और उन्हीं के बीच छिपा हुआ एक दुर्लभ डबलून.

रेडांग द्वीप वैसा ही डबलून है—उन यात्रियों के लिए, जो समय, साधन और धैर्य की कसौटी पर खरे उतरकर मलेशिया की प्रकृति के इस गुप्त खज़ाने तक पहुंचते हैं. मलय भाषा में इसे पुलाऊ रेडांग कहा जाता है. क्रिस्टल-जैसा साफ़ नीला पानी, दूधिया सफ़ेद समुद्र-तट और भीड़ से दूर शांति—रेडांग की पहचान हैं. लेकिन यहां पहुंचना आसान नहीं है, और शायद यही इसकी सुंदरता को सुरक्षित रखता है.
यात्रा की शुरुआत
पश्चिम मलेशिया की यात्रा में कुआलालंपुर (KL) को आधार बनाना समझदारी है. KL से देश के किसी भी कोने तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान है. रेडांग तक पहुंचने का सबसे सरल तरीका हवाई यात्रा है—बर्जया एयर की सीधी उड़ानें सुबांग एयरपोर्ट से उपलब्ध हैं. लेकिन यदि आप भीड़भाड़ वाले रास्तों से बचना चाहते हैं, तो कुआलालंपुर से कुआला तरेंगानू (KT) तक बस लेना एक अलग ही अनुभव देता है. यह यात्रा लगभग 6–7 घंटे की होती है. वहां से शाहबंदर या मेरांग जेट्टी होते हुए नाव द्वारा द्वीप पहुंचा जा सकता है.
यात्रा का समय बहुत मायने रखता है—यह बात मैंने अनुभव से सीखी. 2019 में मैंने ईद के आसपास रेडांग जाने का निर्णय लिया. मलेशिया में हरि राया पूआसा के दौरान लंबी छुट्टियां होती हैं, और उस समय मलय, चीनी और भारतीय—तीनों समुदायों के लोग छुट्टियों पर निकल पड़ते हैं. नतीजा: भीड़, ट्रैफ़िक और अनिश्चितता.
योजना और ‘चांसिंग’
अगर ईमानदारी से कहूं, तो मैंने रेडांग की योजना नहीं बनाई थी—जो किया, वह ‘मानव-निर्मित आपदा’ की श्रेणी में आता है. मैं अक्सर किस्मत को ज़रा ज़्यादा ही आज़माती हूं. कुछ लोग इसे लापरवाही कहते हैं, मैं इसे ‘चांसिंग’ कहती हूँ—अनिश्चितता के साथ दोस्ती.
मंगलवार की रात मैंने ईज़ीबुक से कुआला तरेंगानू की बस टिकट बुक की. मेरी सबसे बड़ी भूल यह थी कि मैंने फेरी टिकट पहले से बुक नहीं की. रात की यात्रा आरामदेह होती है—मलेशिया की बसें विमान जैसी सुविधाओं से लैस होती हैं. लेकिन ईद से पहले का KL ट्रैफ़िक किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था. रात 9 बजे बस चली और एक घंटे बाद जब मेरी आंख खुली, तो हम अब भी KL में ही थे. सुबह 4:30 बजे हम शाहबंदर बस टर्मिनस पहुंचे—और वहां तो बस इंतज़ार था.
मैं न तो एकल महिला यात्री हूं, न ही अत्यधिक योजनाबद्ध. मैं उस श्रेणी में आती हूं—“बोर हो रही हूं, चलो यात्रा पर निकलते हैं.” यह तरीका हमेशा सुरक्षित या सुविधाजनक नहीं होता, लेकिन अब तक ब्रह्मांड ने मेरे लिए रास्ते बनाए हैं. वहीं मुझे कुछ और यात्री मिले, जिनके साथ मैंने समूह बना लिया. जल्द ही समझ आ गया कि यह समूह मुझसे भी ज़्यादा अनभिज्ञ था. मजबूरी में मुझे नेतृत्व संभालना पड़ा—क्योंकि रेडांग अब भी दो घंटे दूर था.
समुद्र तक का संघर्ष
शाहबंदर जेट्टी पर पता चला कि सुबह 9 बजे की फेरी पूरी तरह भर चुकी है. अगली उपलब्ध फेरी 3:30 बजे की थी—जो द्वीपों के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त समय माना जाता है. शाम तक मौसम बिगड़ने की संभावना रहती है. हमने निजी स्पीडबोट का विकल्प चुना. स्पीडबोट मेरांग जेट्टी से मिलती थी, जो KT से लगभग एक घंटे दूर है. ईद के कारण ग्रैब उपलब्ध नहीं था, इसलिए टैक्सी ली—महंगी थी, लेकिन विकल्पहीनता में स्वीकार्य.

लगभग एक घंटे की नाव यात्रा के बाद, सुबह 10 बजे, हम अंततः रेडांग पहुंचे. मेरी थकान, नींद की कमी और झुंझलाहट उसी पल ग़ायब हो गई. जैसे ही मैंने द्वीप की रेत पर कदम रखा, रेडांग ने स्वयं को मेरे सामने प्रकट किया—एक खज़ाने की तरह. नीले पानी में तैरती मछलियां, किनारे बिखरी प्रवाल-शिलाएं, नारियल के पेड़—सब कुछ किसी चित्र की तरह सजीव था.
आत्मबोध और सौंदर्य
मैं पानी में उतर गई—बिना कमरे में गए, बिना किसी योजना के. यह मेरा क्षण था. यात्रा की हर कठिनाई सार्थक लगने लगी. लेकिन यात्रा केवल स्थानों की नहीं होती—वह आत्मा की भी होती है. भूख, असुविधा और मेरे शाकाहारी होने की समस्या ने मुझे मेरी सीमाएं दिखाईं. विडंबना यह रही कि जिन लोगों को मैं मन ही मन तुच्छ समझ रही थी, वही मेरे सहारा बने. उस दिन मैंने कृतज्ञता, विनम्रता और साथ चलने का अर्थ सीखा.
जंगल, पहाड़ और मौन
दोपहर में हम पास की पहाड़ी पर चढ़े—समुद्र तल से लगभग 300 फ़ुट ऊपर. रास्ता कठिन था, लेकिन ऊपर पहुंचकर जो दृश्य मिला, वह अविस्मरणीय था. नीचे फैला नीला समुद्र, चारों ओर घना जंगल और प्रकृति का संगीत—झींगुर, मेंढक, पक्षी और पत्तियों की सरसराहट. हर जंगल अपनी अलग भाषा बोलता है—यह मुझे वहीं समझ आया.
प्रकृति के प्रति ज़िम्मेदारी
रेडांग एक समुद्री संरक्षण क्षेत्र है और कछुओं का प्राकृतिक निवास. अत्यधिक पर्यटन और प्लास्टिक प्रदूषण ने इस सौंदर्य को खतरे में डाला है. मेरे यात्रा के समय – 2019 – में भी यह चिंता उतनी ही प्रासंगिक थी जितनी आज है. मैंने स्नॉर्कलिंग से दूरी रखी और केवल समुद्र को निहारते हुए, झूले पर लेटकर समय बिताया.

द्वीप पर रात की बारिश डरावनी थी—लहरें ऊंची उठतीं, पानी भीतर तक आ जाता. लेकिन प्रकृति अपना संतुलन जानती है. सुबह सब शांत था.
वापसी और निष्कर्ष
वापसी में MyBas बस ने हमें KT तक पहुंचाया और वहां से KL. रास्ता लंबा था, लेकिन मन शांत. रेडांग केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है—यह एक अनुभव है.
रेडांग जाएं—लेकिन पर्यटक की तरह नहीं, यात्री की तरह. ज़िम्मेदारी से, विनम्रता से और प्रकृति के प्रति आदर के साथ. तभी यह डबलून आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहेगा.
- Redang Island (Pulau Redang), Kuala Lumpur, Malaysia यात्रावृत्तांत 2019 की स्मृतियों से
ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ी लेखनी