औरत की पहचान

A passing out parade of the BSF

औरत… जिसकी आंखों में एक ही सपना, मन में एक ही ख्याल. दिल में एक ही ज़िद, एक पहचान. बस. क्या रोज़ सुबह उठकर आप नहीं सोचते कि आप कहां तक पहुंचे, अपनी ज़िन्दगी में. क्या हासिल किया, कितनी इज्ज़त मिली, कोई पहचान बनी?

मैं रोज़ सोचती हूँ. दिन भर में ऐसे कई वाक्यात होते हैं जो आप को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. कई बार सुनने को मिलता है – तुम रहने दो. ये औरत का काम नहीं. तुमसे क्या होगा, जाने दो.

ना तो मैं फेमिनिस्ट हूँ, ना वुमन लिब्रेशन की कोई लड़ाई लड़ रही हूँ. मुझे तो चाहिए, इज्ज़त. यह किस्सा सारे बाज़ार होता है और हर घर में देखने को मिलता है. अपने घर और दफ्तर में ही औरत को इज्ज़त नहीं मिलती.

औरत को एक ही चीज़ तो चाहिए. उसकी मेहनत को सराहा जाए. कम से कम उसकी बेइज्जती तो न की जाए. अब वो बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां हों या फिर अपना घर, औरतों को हर जगह दबाया जाता है. औरतें जब भी मर्दों से आगे जाना चाहती हैं, उन्हें वहीं कुचल दिया जाता है.

जब मैं छोटी थी और बहुत समझ नहीं थी तब एक गाना सुना था. तब मुझे समझ में नहीं आया कि ये क्या गाना है – ‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया, जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया.’

इस गीत को गया था लता मंगेशकर ने और इसे वैजयंती माला बाली पर फिल्माया गया था. इन दोनों औरतों ने अपनी एक पहचान बनाई और खूब उंचाई तक उड़ान भरी. ये अलग बात है कि इस मुकाम तक आने के लिए उनकी लड़ाई का ज़िक्र शायद कहीं पढ़ने को न मिले.

नए ज़माने में हर औरत अपने लिए एक मुकाम बना चुकी है. हर जगह उसकी पहुंच है और वो बस ये चाहती है कि उसे उसकी पहचान से जाना जाए. पैसा भी वे मर्दों से कम नहीं कमातीं, थोड़ा कम या ज्यादा.

लेकिन, इतनी तरक्की के बाद भी जेंडर इनइक्वलिटी हर जगह देखने को मिलती है. हार्वर्ड बिज़नस स्कूल की कैरलाइन विलमाउथ के मुताबिक आदमी और औरतों के सोचने के तरीके और प्रेफेरेंस में बहुत अंतर होता है और इसीलिए दोनों के आउटकम में फर्क होता है. धीरे-धीरे शायद ये भी कम हो जाए.

2016 में एक फिल्म आई थी की एंड का, जिसमें औरत घर का काम न करके दफ्तर जाती है और खूब तरक्की पाती है. और उसे एक ऐसा आदमी भी मिल जाता है जो घर जमाई के जैसे रहना चाहता है और घर का काम करना चाहता है. दोनों शादी भी कर लेते हैं. क्या ये आइडियल सिचुएशन है?

सभी उस आदमी की तारीफ करते हैं कि वह यह कमाल कैसे कर लेता है. फिर वह सोशल मीडिया के सहारे मशहूर हो जाता है. यहां तक कि लड़की के दफ्तर वाले भी उसके काम की तारीफ़ कम और उसके पति की कशीदे ज्यादा पढ़ते हैं. आप क्या कहते हैं? इसमें भी मर्द की ही जीत.

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गीतांजलि कौल Image Consultant, Brand Builder. Founder of G Caffe, Touching Lives Spreading Smiles

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