बदलती रही है लेखनी

history of paper and writing

लेखनी और संचार माध्यम से ही वैचारिक आदान होता रहा है. किसी भी भाषा या देश का पूरा इतिहास, शासन प्रबंध और साहित्य केवल उसकी लेखन संपदा पर निर्भर करता है. परंतु आश्चर्य इस बात से होता है कि जब लिखने के वर्तमान साधन प्रयोग में नहीं थे तो क्या उस समय भी लिखित रूप से संचार करना इतना ही सरल हुआ करता था?

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि यह कहा जाए कि जिस प्रकार पृथ्वी पर आदिमानव से मानवों की क्रमागत उन्नति हुई, उसी प्रकार लिखित माध्यम भी विकसित हुआ है. यहां लिखित माध्यम से तात्पर्य है, भाषा, लिपि एवं लेखन सामग्री. वर्तमान में बहुप्रचिलित कागज़ हमारे देश में केवल पिछले एक हज़ार वर्ष से उपयोग में आया है.

हम अगरु पत्र, कपड़ा, कांच, काष्ठ, चमड़ा, पत्थर, स्वर्ण व रजतपत्र, मिट्टी की ईंटों व मुहरों तथा शंख व हाथी दांत जैसी वस्तुओं का उपयोग किया करते थे. आज निसंदेह ये सभी चीजें केवल संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं, परंतु अपने समय में इन्होंने हमारी संस्कृति और उसके विज्ञान की बहुत सेवा की है. स्याही के भारत में आविष्कार से पूर्व, वनस्पतियों के प्राकृतिक अर्क के प्रयोग से शैलचित्र बनाए जाते थे जिनके कुछ नमूने हमें भीमबेटका, पचमढ़ी जैसे पौराणिक स्थानों से मिले हैं.

पुराने समय में लेखन उपलब्ध था या नहीं, ये आज भी रहस्य है क्योंकि तब के काल को आज भी कुछ लोग ‘श्रुति’ (अर्थात सुना हुआ) और कुछ लोग ‘ऋचा’ (अर्थात रचित) मानते हैं. ईसा पूर्व 3000 में पहली बार मिस्र में पेपिरस का आविष्कार हुआ जो वर्तमान कागज़ का प्रारंभिक रूप माना जाता है. उसके बाद ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में चर्मपत्र प्रयोग में आया जिसमे भेड़ बकरी आदि के खाल से लेखन सामग्री बनाई जाने लगी. फिर सन 105 में चीन में वर्तमान कागज़ का आविष्कार हुआ जिसे आज तक लेखन सामग्री की सबसे बड़ी क्रांति के रूप में देखा जा रहा है.

अपने वर्तमान तकनीकी और मशीन युग के लेखन पर नज़र डालें तो कागज़ को भी पीछे छोड़ते हुए अब हम अधिकांश प्रयोग लैपटॉप और मोबाइल की स्क्रीन का ही करते हैं. चिट्ठियों का स्थान भी एस.एम.एस और व्हाट्सएप जैसी सेवाओं ने ले लिए हैं. अब अपने चाहने वालों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कोई डाकिये का इंतज़ार नहीं करता. इस परिवर्तन से जहां एक ओर हम डिजिटल प्रगति के कई पायदान ऊपर चढ़े हैं वहीं वार्तालाप से जुड़ी संवेदनाओं और भावनाओं को हमने खो दिया है.

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अंशु गुप्ता प्रकृति की छांव में.

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