वोटिंग मशीन में गड़बड़ी है तो सन्नाटा क्यों

वोटिंग मशीन

पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा के विधान सभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में गड़बड़ी का आरोप उन सभी पार्टियों ने लगाया है जो वहां सरकार बनाने से चूक गईं. सवाल उठता है कि अपने आरोप पर उन्हें इतना भरोसा है तो उन पार्टियों के नेता अपने घरों और दफ्तरों में क्यों बैठे हैं? वे सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे ताकि उन्हें वोट देने वाली जनता उनके साथ खड़ी हो सके. अगर ईवीएम में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है तो इस कथित धांधली का शिकार हुए राजनीतिक दल क्या ठंडे मौसम का इंतज़ार कर रहे हैं?

शरद यादव जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो वोटों की गिनती से पहले ही पॉलिटिकल पार्टी के भरोसे या घबराहट से चुनावी नतीजों का पता चल जाता है. शरद यादव को 1999 लोकसभा चुनाव में भरोसा नहीं था कि वे लालू यादव को हरा देंगे. शरद यादव बूथों पर कब्ज़ा और गड़बड़ी के खिलाफ बिहार के मधेपुरा में धरने पर भी बैठ गए थे, लेकिन नतीजा आया तो वो करीब 35 हज़ार वोट से जीत गए.

अतः अगर किसी पॉलिटिकल पार्टी को लगता है कि वोट मशीनें वाकई दोषपूर्ण हैं और मशीनों में की गई गड़बड़ियों की वजह से उन्हें हार मिली है तो यह धोखा सिर्फ उनके साथ नहीं हुआ है बल्कि उन वोटरों के साथ भी हुआ है जिन्होंने उन्हें वोट दिया. सरकार बनाने में असफल पार्टियों को उन सभी मतदाताओं को लेकर दबाव बनना चाहिए वर्ना बेकार में चुनाव आयोग पर तोहमत नहीं लगाना चाहिए. बड़ी-बड़ी ताक़तवर सरकारें आईं और चली गईं. चुनाव आयोग काफी हद तक निष्पक्ष है और उम्मीद है कि रहेगा.

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी ईवीएम को लेकर निर्वाचन आयोग यानी इलेक्शन कमीशन को चुनौती दी है जबकि आयोग ने उन्हें नसीहत दी है कि ईवीएम को दोषी बताने के स्थान पर केजरीवाल को पंजाब में अपनी हार पर आत्ममंथन करना चाहिए.

समझदारी की बात यह है कि पराजय को खेल भावना से लेना चाहिए और फिर कोशिश करनी चाहिए. रहिमन, कबीर, बिहारी जो भी अच्छे लगें उनके दोहे पढ़ने चाहिए और निराशा के गर्त से बाहर निकलकर नई कोशिशों में जुट जाना चाहिए. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट, सेना और इलेक्शन कमीशन जैसी संस्थाओं में देश की काफी आस्था है और माना जाता है कि ये ईमानदारी से अपना काम कर रही हैं. इन्हें दाग़दार बताने से लोग वोट देना भी छोड़ देंगे.

चुनाव ही हमारी लोकतांत्रिक आस्था की ताक़त है, ये आस्था टूटी तो फिर अराजकता ही होगी. सुधार करने ही हैं तो जात पात, धर्म, क्षेत्र और संप्रदाय से चुनावी राजनीति को दूर रखने पर ज़ोर देना चाहिए. ऐसा हो जाने पर हम और भी बेहतर लोकतंत्र साबित हो सकते हैं.

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अरुण पांडे गम से घबराना नहीं, ख़ुशी से इतराना नहीं. Liberal but with extreme views on social issues. Loves persons who have few complaints about system.

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