शिक्षा, संस्कार, भाषा, बोली, रहन-सहन पीढ़ी दर पीढ़ी नए रूप में दिखाया-अपनाया जाता है. इनमें किसी तरह का बदलाव संघर्ष पैदा करता है. तब जो खिंच-तान बनती है उनसे रिश्तों का आकार संवरता या बिगड़ता है.
ऐसा ही कुछ ‘फेरारी की सवारी’ में देखने को मिलता है. ‘थ्री ईडिअट्स’ एवं ‘मुन्ना भाई’ जैसी प्रसिद्ध फिल्मों से ख्याति प्राप्त कर विधु विनोद चोपड़ा एवं राजकुमार हिरानी की जोड़ी ने इस नई फिल्म में एक बच्चे के ख्यालों की उड़ान को जो पंख लगाया है उससे आज के बच्चों को तो सीख मिलती ही है साथ ही किसी-मोड-पर-कदम-ना-रुके का हौसला भी दिखता है.
‘रोम एक दिन में नहीं बनाया गया था’. ‘बूँद बूँद से घड़ा भरता है’. ‘सपने वो नहीं जो आप रातों में देखते है. सपने वे होते हैं जो आपको सोने नहीं देते’. ‘कदम कदम बढ़ाये जा’. — ये सारे हौसला देने वाले कथन ‘फेरारी की सवारी’ में चरितार्थ होते हैं.
इस फिल्म में एक प्रतिभाशाली बालक को क्रिकेट के खेल में अपनी महारथ दिखाने के लिए पग-पग संघर्ष करना पड़ता है. वह बालक इतना बखूबी अपने चरित्र को निभाता है कि शर्मन जोशी एवं बोमन ईरानी जैसे स्थापित कलाकारों को भी मीलों पीछे छोड़ जाता है. बिना किसी अभिनेत्री के होते हुए भी यह फिल्म चमकती है, जबकि एक आइटम नंबर के लिए ठूंसी गयी विद्या बालन निराश करती हैं.
यकीनन एक बच्चे की फेरारी गाड़ी का धुंआ फिल्म में दर्शाये गए तीन पीढ़ियों पर भी खूब भारी पड़ता है. फिल्म में एक दादाजी हैं जो कभी क्रिकेट के एक अच्छे खिलाड़ी थे. वो महान बन सकते थे परन्तु इर्ष्या एवं धोखाधरी का शिकार बनने के बाद उन्होंने अपनी दूसरी पीढ़ी को हिदायत एवं चेतावनी के तौर पर क्रिकेट एवं आधुनिकताओं से दूर ही रखा.
परन्तु क्रिकेट से वंचित बीच की पीढ़ी का व्यक्ति जब बाप बनता है तब अपने सीमित संसाधनों के बावजूद वह अपने बच्चे (जो तीसरी पीढ़ी से है) की छोटी-छोटी इच्छाओं एवं ज़रूरतो को पूरा करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता.
अंततः हर परिस्थिति को उस बच्चे के हौसले के सामने झुकना पड़ता है, ताकि सचिन तेंदुलकर जैसे महान क्रिकेटर बनने का ख्वाब वह पूरा कर सके. सच – सपने देखोगे तभी उसे पूरा कर सकोगे.
- नीरज भूषण | दिल्ली






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