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भागते जमाने का भोंपू

जुलियस सीजर की शव यात्रा पर एंटनी ने क्या कहा ? इतिहास की किताबों से ज्यादा अंग्रेजी साहित्य और रंगमंच में वर्षों से इस पर रट्टा लगाया जाता रहा है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी विलियम शेक्सपियर के इन किरदारों के कथनों को एक कान से दुसरे कान स्थानान्तरित करती रही है. मैदानों और रामलीलाओं में जवाहर लाल नेहरु के भाषण और राम की रामायण लोग देखते-सुनते रहे हैं.

वक्त वह भी था जब टेलीविजन पर समाचार देखने के लिए 24 घंटा इंतजार करना पड़ता था और दिन में क्रिकेट मैचों के दौरान प्रसारण हो भी रहा हो तो उसे इंदिरा गाँधी की हत्या होते ही एकदम से बंद कर दिया जाता था. फिर रात को ही जाकर सफेद कपड़ा और गंभीरता पहने समाचार वाचक की बुलेटिन से पता चलता था की देश की प्रधानमंत्री की सुबह उनके निवास पर उनके सुरक्षा गार्डों द्वारा हत्या कर दी गयी.

अब जमाना बदल गया है. बी.बी.सी. रेडियो और वाईस ऑफ अमेरिका से भी तेज विचार एवं समाचार तीव्रता के साथ हर जगह एक ही समय पहुँच रहे हैं. लाइव टेलीविजन पर भी घटनाओं और सभाओं का वह चेहरा नहीं आता जो अब भागते जमाने का भोंपू – ट्विटर - दे रहा है.

मुंबई का 26/11 का आतंकी हमला हर चैनल पर लाइव आ रहा था. और अचानक सुरक्षा एजेसियों के हस्तक्षेप से कैमरों का फोकस बदल दिया गया. परन्तु वह जिसे बदला नहीं जा सकता था, मुंबई के कोने-कोने से पूरे विश्व को पल-पल की, पग-पग की खबरें बताए जा रहा था. वह ट्विटर ही था जो बुद्धू बक्सों से तेज, सीधा और तेजी से मोबाइलों में हर गोली की आवाज, हर बम का धमाका लोगों तक पहुँचा रहा था.

यह भोंपू अब एक ऐसा फोरम बन गया है जहाँ कोई रोक नहीं, कोई टोक नहीं. जहाँ सूचना बहती जा रही है. आपने कुछ बोला नहीं की आपका कथन इतिहास बन जाता है. अगले सेकण्ड की घटना तुरन्त ही फिर इतिहास. इस ट्विटर की कोई थाह नहीं, कोई राह नहीं. जो देखा उसे बताया, जो मिला उसे सुनाया. सच है, इसके नशे में धुत लोगों से भयंकर गलतियाँ भी होती हैं. और इस भोंपू को इमानदारी से बजाने पर शशि थरूर जैसे लोगों के हाथ से विदेश मंत्रालय भी छीन जाता है. इसका इस्तमाल ही बराक ओबामा जैसे एक ब्लैक को वाईट हाउस में घुसा देता है. काश महात्मा गाँधी के समय ट्विटर रहा होता !

स्कूलों, आफिसों, कोर्टों में मोबाइल बजने पर पाबंदी हो सकती है. परन्तु शांत अवस्था में भी मोबाइल के की-पैडों पर गिलहरियों की फुर्ती से चलते अंगूठों ने ट्विटर को आज दुनिया का सबसे शक्तिशाली माध्यम बना दिया है. यह आपके मन के समान गति से इंग्लैंड से ऑस्ट्रेलिया, चीन से अफ्रीका, एक ध्रुव से दुसरे ध्रुव सूचना को पलक झपकते प्रसारित कर रहा है.

इस माध्यम में न्यूज भी है, व्यूज भी. आपकी ही अँगुलियों से आपके ही मन की स्थिति आपसे ही लिखवा कर यह भोंपू सैकड़ों, लाखों लोगों की मनःस्थिति को प्रभावित कर रहा है. आज हर आम आदमी हर खास आदमी से ट्विटर के माध्यम से सीधा संपर्क में है.

महात्मा गांधी जब कुछ कहते थे तब उनकी बातें कई दिनों बाद लोगों तक पहुंचतीं थीं. लेकिन आज जब उनके पोते तुषार गांधी जो कुछ सोच भी रहे होते हैं तो वह उसी क्षण कश्मीर से कन्याकुमारी उनके मोबाईल में लगे ट्विटर के माध्यम से लोगों तक पहुँच रहा है. तो क्या ट्विटर को हम इस सदी की सबसे बड़ी क्रांति कहें ? आप जो कोई भी हों, जो कुछ भी हों, आपकी हर बात सुनने के लिए कोई-न-कोई कहीं-न-कहीं  है. और अगर आपकी बात में दम है तो प्रतिदिन आपके ‘फालो’ करने वालों की संख्या बढती रहेगी. जहाँ बोलने की आजादी सिर्फ संविधानों में ही कैद है, वहाँ तो ट्विटर मन की हर गाँठ को खोलकर रख देता है. यह बोलने की, अपना मन कहने की सच्ची आजादी देता है. और तो और, यह बिलकुल मुफ्त भी है.

यहाँ कोई रोक नहीं, कोई टोक नहीं; यहाँ सूचना बहती जा रही है.

अगर आपके कम्प्युटर और मोबाइल में इन्टरनेट सुविधा है तो आप रक्त दान करते हुए भी अपने नेक कार्य की ‘फीलिंग’ लोगों से बाँट सकते हैं और मीटिंग में बॉस के भाषण को अपने ट्वीट के माध्यम से भैंस का रेंगना करार दे सकते हैं. किसी घटना पर ट्वीट करने के लिए आपको किसी न्यूज एंकर की तरह बक-बक करने की जरूरत नहीं है, ना ही दाढीवाले एक्सपर्ट की तरह भारी भरकम सुझाव देने की जरूरत है. यहाँ तो सिर्फ 140 अक्षरों में ही खेल हो जाता है. कम-से-कम शब्दों में आप अपनी बात कह सकते हैं.

ट्विटर ऐसा माध्यम है जहाँ ए.आर रहमान के द्वारा कामनवेल्थ के थीम सांग का लांच सुनते-सुनते आप उस छः करोड के गाने को छः कौड़ी का भी बता सकते हैं. नयी अंग्रेजी और नयी हिंदी के आविष्कारक भी बन सकते हैं. और यहाँ आपके टाइपिंग की गलतियों पर ध्यान देने वाले कोई मास्टर साहेब भी नहीं मिलेंगे. आपने कुछ सोचा नहीं, 140 या उससे कम अक्षरों में उसे लिखा नहीं, और एक बटन दबाया नहीं कि आपकी बात राकेट की स्पीड से पहुँच गयी विश्व के इस कोने से दुसरे कोने तक.

आज बड़े-बड़े लोगों को अपना प्रवक्ता रखने की, भाषण लिखने वालों की, ब्लॉग भरने वालो की जरूरत नहीं. जरूरत है तो सिर्फ ट्विट करने की. इस माध्यम से वे छाये जा रहे है. मधुमख्खी के छत्तों की तरह पत्रकार उनके ट्विटर के पते पर जमे बैठे रहते हैं. आप सोये भी हैं तो आप तक सचिन तेंदुलकर का छक्का, अमिताभ बच्चन का विज्ञापन, लता मंगेशकर का गाना, शकीरा का डांस, माइकल जैक्सन की मृत्यु की खबर टप-टप आपके ट्विटर पते में खुद-ब-खुद गिरे जा रही है. भागते जमाने का यह भोंपू सचमुच नए ज़माने की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया है. लेकिन ट्विटर का यह बखान सिर्फ 140 अक्षरों में किया जा सकता है क्या ?

- नीरज भूषण

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2 Responses to "भागते जमाने का भोंपू"

  1. Atanu Das says:

    Keep it up. Bravo…

  2. Ramesh Rawat says:

    It is twitter where the rich and poor, king and subject, mantri and santri all are present and share freely. Thank you Twitter. Enter text right here!

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