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बारदान का संकट और मौसम की मार

मध्य प्रदेश में बारदान (गेंहूँ रखने की जूट थैली) की समस्या से ग्रस्त किसानों को मौसम की बेरुखी ने और चिंताग्रस्त कर दिया है. बारदान की व्यवस्था करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी माना जाता हैं पर यह बड़ा प्रश्न है कि यह किल्लत तब ही सामने क्यों आती है जब किसान अपनी पकी हुई फसल लेकर मंडी के दरवाज़े पर खड़ा होता है.

हम जैसे आम व्यक्ति को भी ये बात समझ में आती है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में फसल कि खरीद व भण्डारण सरकार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए पर केंद्र सरकार का कहना है कि उसने पर्याप्त मात्रा में बारदान की गांठे राज्य सरकार को मुहैय्या करवाई थी पर राज्य सरकार इसे उठा नहीं रही.

राज्य सरकार अपना पक्ष रखती है कि उन्हें बारदान नहीं मिला है. यह आश्चर्यजनक हैं कि दोनों ही अपनी बात कर रहे हैं — फिर इस संकट का दोषी कौन?

इन्ही बयानों के बीच किसान अपनी फसल को लेकर मंडी के दरवाज़े पर लाचार खड़ा है कि कब उसका गेंहूँ तोला जायेगा और उसे अपनी फसल का उचित मूल्य मिलेगा.

केंद्र सरकार की नीतियां समझ के परे है — जब बारदाने की इतनी मांग है तो बंगाल का जूट उद्योग क्यों रसातल में जा रहा हैं? क्यों अधिक उत्पादन के द्वारा मांग को पूरा कर जूट उद्योग को लाभ की स्थिति में नहीं लाया जा रहा?

क्या जूट उद्योग को बचाने के लिए सरकार के इरादे मजबूत हैं? राज्य सरकार की मंशा भी कुछ साफ़ दिखाई नहीं देती क्योंकि बारदान के संकट का प्रचार निजी कंपनियों के प्लास्टिक बैगों को खरीदने का बहाना था. क्यों केंद्र द्वारा प्लास्टिक बैग खरीदने को दी गयी सहमति के पश्चात राज्य के मुखिया इस विषय पर चुप हैं?

जब राज्य सरकार बारदान की समस्या पर इतनी इमानदार थी तो फिर आज बारदान की समस्या क्यों हैं?

इससे साफ़ जाहिर होता हैं कि किसानो की समस्या से सरकार को कोई वास्ता ही नहीं था क्योंकि यहाँ मंशा ही नहीं झलकती कि सरकार किसानो से सीधे गेंहूँ खरीदना चाहती है.

यह संकट खड़ा करने में इरादा साफ़ दिखाई देता है कि व्यापारियों और उद्योगपतियों को खुश करने व कुछ पाने की ललक में सरकार ने किसानो को मजबूर कर दिया हैं कि वे या तो अपना माल बड़े व्यापारियों को कम दामों में बेच दे जिससे व्यापारी मंडी में या बाज़ार में माल बेचकर तगड़ा मुनाफा कमा सके और किसानो को मिलने वाला बोनस भी हड़प ले.

किसानो की परेशानी यह भी है कि पंजीयन वाले किसान भी सरकारी और सहकारी समितियों को अपना माल बेचने में कतरा रहे हैं क्योंकि इन समितियों के पास बिजली, सिचाई, सोसायटी और राजस्व का जो भी बकाया हैं, सबकी सूची भेज दी गयी है.

निश्चित है कि प्रदेश का किसान जो पहले ही अथा कर्ज और संकट में डूबा हुआ हैं उससे इस सारे बकाये को वसूल कर लिया जाये तो अधिकतर किसानो को मंडियों से खली हाथ ही घर लौटना पड़ेगा. अब किसानों के सामने नया संकट हैं कि उसके परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्वों का क्या होगा.

इस देश में किसानो के साथ सदैव यही हुआ है और फिर हो रहा है. प्रदेश सरकार मौन है और किसान संकटग्रस्त.

इन सब में प्रदेश सरकार की किसान नीति यही दर्शा रही है कि बारदान में निजी कंपनियों के प्लास्टिक बैग का प्रचलन बढ़ाना और उद्योगपति को फायदा देना जिससे चुनाव के वक़्त मोटा चंदा वसूला जा सके और किसान के कठोर परिश्रम की कमाई को सटोरिये और बड़े व्यापारियों की तिजोरी में पहुचाना.

सरकार का यह कदम शोषण और असमानता के मार्ग को प्रशस्त करता है.

- प्रशांत सोहले | उज्जैन

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One Response to "बारदान का संकट और मौसम की मार"

  1. DHARMENDRA SHARMA says:

    ye state government & central government dono ka kiya dhara he, apne apne lekh me real mistake ya chook ka real analysis kiya he.
    thanks prashant ji for such wonderful artical.
    government apni responsibility se bach nahi sakti.

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