उर्दू सुनते ही भारत के सोंधी मिट्ठी की सुगंध का एहसास होने लगता है. भारत में जन्मी, पली-बढ़ी उर्दू विश्व के अनेक देशों में लोकप्रिय हुई. भारतीय सभ्यता संस्कृति एवं मार्यादाओं से इसने अपने दामन का बेल-बुटा सजाया. जीवन के प्रत्येक रंगो में रच-बस कर साहित्य की दुनिया में अपना अमिट छाप छोडा़.
भारतीय सिनेमा जगत के सौ साल के सफर में उर्दू ने अपना बहुमुल्य योगदान देकर फिल्मों को अरबों की इन्डस्ट्री बनाया. विद्युत गति से विकास करते व्यवसायिक प्रतिष्ठानों ने भी अपनी मार्केटिंग हेतु उर्दू को गले लगाया.
हँसती मुस्कुराती उर्दू ने ऐड एजेन्सियों का भी भरपूर साथ दिया. मीडिया ने जीवन के तहदार गुथ्थियों को सुलझाने हेतु प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक तक हर स्तर पर उर्दू का प्रयोग किया जिससे जन आकांक्षाओं का विश्लेषण एवं समस्याओं के समाधान का मार्ग सरलता पुर्वक व्यक्त हो पाया. पूरे राष्ट्र में लगभग 80 प्रतिशत लोगों की बोल-चाल में उर्दू का प्रयोग है.
उतार-चढ़ाव प्रकृति का नियम है. उर्दू भी इससे अछूती नहीं रही. जब तक पं॰ दयाशंकर नसीम, पंडित आनन्द नरायण मुल्ला, मुंशी नवल किशोर जैसे सैकड़ों देश भक्तों की छत्र-छाया उर्दू पर रही तब तक इनकी बेमिसाल उर्दू साहित्य सेवा, मुद्रण एवं प्रकाशन से बहुमुल्य योगदान मिलता रहा. फलस्वरुप उर्दू लिपि अमर हो गई. जैसे-जैसे दिन बितता गया वैसे-वैसे उर्दू का विकास हुआ. भारतीय स्वतंन्त्रता संग्राम की प्रखर सिपाही उर्दू ने उंच-नीच तथा भेद-भाव के कई मंजिलों को देखा.
स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने संग्राम को तेज और धारदार बनाने के लिए उर्दू का प्रयोग किया. पं॰ रामप्रसाद बिस्मिल की यह पंक्ति – “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जो़र कितना बाजु-ए-कातिल में है” – रहती दुनिया तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के साथ अमर रहेगी.
जब उर्दू को महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने स्वतंत्रता संग्राम में अस्त्र. शस्त्र एवं ढ़ाल बनाया तो “अलहेलाल“ एवं “अलबलाग़“ के रुप में कोलकाता में इसने अपना जलवा दिखाया. अंग्रेजी शासन ने उर्दू को अपने सम्राजवाद के विरुद्ध बड़ी ताकत समझकर कई बार इनके प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगाया.
जब 1947 ई॰ में भारत स्वतंत्र हुआ तो सबकी चहेती उर्दू की घिघ्घी बंधने लगी. राजनेताओं ने उर्दू को जनमत संग्रह का साधन बना डाला. कथित सेकुलर राजनैतिक दलों ने उर्दू के लिए घड़ियाली आंसू तो जरुर बहाया परन्तु कथित सामप्रदायिक राजनैतिक दलों ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर इसे प्रताड़ित करने का सरकारी स्तर पर सुनियोजित षड्यंत्र रच दिया.
तब से उर्दू अपनी संवैधानिक एवं मौलिक अधिकारों से दूर होती चली गई. अगर इस भाषा में गंगा-यमुनी संस्कृति की मिश्रित गाथाएं प्रकाशित नहीं हुई होती तो अब तक यह विलुप्त हो गई होती. उठे मन से ही सही पं॰ बृजनारायण चकबस्त की जयंती अथवा पुण्य तिथि पर उर्दू की महफिल लगाकर चकबस्त के द्धारा लिखित पवित्र उर्दू रामायण को सुना जाता है.
अपने को अत्यधिक सेकुलर कहने वाले मुसलमानों को सुल्तान टीपू, मोअज्जम अली और तलवार टुट गई एवं सीरतपाक (पैगम्बर मोहम्द सं॰ की जीवनी) की पुस्तकों को मजबूरी में ही सही पढ़ना पड़ता है. इस तरह एन-केन-प्रकारेन उर्दू का अस्तित्व झिलमिल-झिलमिल दिखाई दे रहा है.
यह अलग बात है कि उर्दू रोजी रोटी का सुगम मार्ग प्रशस्त करती है. लाचारी में ही सही भारतीय सिनेमा निर्माण करने वाली कम्पनियों ने अपने यहां उर्दू सिखने-सिखाने के कोचिंग का प्रबंध कर रखा है. जिन कम्पनियों के पास यह सुविधा नहीं है वह किसी भी कलाकार को तब तक काम नही देते जब तक वह उर्दू की कोचिंग कर किसी प्रतिष्ठित उर्दू कोचिंग से प्रमाण पत्र नही ले लेते.
लगभग पूरे भारत में उर्दू लिखा, पढ़ा और बोला जाता है. कश्मीर, पंजाब, हरयाणा एवं दिल्ली आदि राज्यों में तो उर्दू मुख्य भाषा है. लोक-लाज एवं वोट के चलते कुछ राज्यों में उर्दू को सरकार ने दूसरी राज भाषा का दर्जा भी दिया है. राज भाषा विभाग बनाकर उर्दू को सरकारी भाषाओं के श्रेणी में शामिल भी किया गया है.
इतना होने के बावजूद उर्दू छुआ-छुत एवं पुर्वग्रह से ग्रसित है. राज्य सरकारों में उर्दू निदेशालय मरने के कागार पर है. उर्दू के विकास से संबधित सरकारी फाईलें तहखानों एवं सर्द बस्तों में पडी़ हुई हैं.
उर्दू का विकास मदरसों, विद्यालयों, न्यायालयों एवं निबंधन कार्यालयों के माध्यम से भी निरंतर होता रहा. आज स्कूलों से उर्दू की पुस्तकें गायब हैं. न्यायालयों में अब उर्दू का प्रयोग लगभग समाप्त है. निबंधन कार्यालयों मे उर्दू दस्तावेज लिखने वाले तो हैं परन्तु सरकारी तौर पर उसे पढ़ने या समझने वाले अधिकारी नहीं हैं. उदाहरण के तौर पर बिहार टेस्ट बुक कार्पोरेशन प्रति बर्ष कक्षा 1 से 8 तक की उर्दू पुस्तकें छापती तो जरुर है लेकिन समय पर पुस्तकें विद्यार्थियों तक नहीं पहुँच पातीं.
बिहार के निबंधन कार्यालयों में उर्दू दस्तावेज लिखने या पढने वाला कोई नही है. सरकारी दफ्तरों एवं सार्वजनिक स्थलों पर उर्दू में नेमप्लेट अथवा बोर्ड नहीं के बराबर है. बिहार सरकार द्वारा उर्दू कर्मचारियों को उर्दू सिखाने हेतु जो राशि आवंटित होती है उसे जिलाधिकारी बिना खर्च किए बिहार सरकार को लौटा देते हैं.
ऐसी परिस्थिति में उर्दू का भविष्य पूरे देश में क्या होगा – यहां एक प्रश्नवाचक चिन्ह है. वैसे तो उर्दू के विकास हेतु देश में दर्जनों संस्थाएं अपने-अपने ढंग से काम कर रही है. मुशायरों, सेमिनारों, पत्र-पत्रिकाओं के द्धारा भी उर्दू को समृद्ध बनाने का प्रयास जारी है.
दम तोड़ती उर्दू की नजर सीधा न्यायमूर्ति काटजू, शैलेश लोढा, शमीम अहमद सरीखे लोगों पर टिकी हुई है. उर्दू को विकसित कर उसके मौलिक अधिकारों को दिलाने में उनके आन्दोलनों की सार्थकता क्या होगी, यह समय बताएगा.
राष्ट्रपिता मोहनदास करमचन्द गांधी, पं॰ जवाहरलाल नेहरु, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सरीखे हजारों राष्ट्र भक्तों की मातृभाषा उर्दू अपने ही आंगन में दम तोड़ने को विवश है. उसे किसी चट्टानी हौसला रखने वाले की तलाश है.
नही है ना उम्मीद एकबाल अपनी किशत-ए-वीरा से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बहुत ज़रखेज है साक़ी.
- आरिफ हुसैन, अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा संघ, बिहार; पूर्व उपाध्यक्ष 15-सूत्री कार्यक्रम, गृह विशेष विभाग, बिहार सरकार
संपर्क : 07250634348






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