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क्या ईश्वर ही नफरत का कारण हैं ?

देश में मंदिर और मस्जिद गिरने और गिराने की घटनाएं सुनने को मिलती हैं. अभी कुछ दिन पहले ही ‘दिल्ली डेवलपमेंट आथरिटी’ ने एक मस्जिद ढहाने का काम किया. आपने देखा होगा मस्जिद गिरने पर मुसलमान भाई विरोध करने लगते हैं. वहीं मंदिर गिरने पर हिंदू संगठन और अनुयायी सड़क पर उतर आते हैं.

लेकिन एक बात जहन में आ रही है क्या किसी बेकसूर व्यक्ति के मरने पर और मारे जाने पर भी विरोध होता है ? हर धर्म का व्यक्ति ढांचो को बचाने के लिए विरोध कर रहा है. नारेबाजी हो रही है, लेकिन क्यों मनुष्य कभी मनुष्यता को बचाने की बात नहीं करता ? क्यों यही लोग जो मस्जिद और मंदिर के गिरने पर सड़क पर हो-हल्ला मचा रहे हैं, जब कोई आदमी सड़क किनारे अपना दम तोड़ता रहता होता है या जब आदमी-आदमी का खून बहा रहा होता है तब क्यों कुछ नहीं करते ! क्या ईश्वर यह कहते हैं कि मेरे स्थान को ही केवल जीवित रखो, मनुष्य को मरने दो या उसे हानि पहुंचने दो ?

श्रद्धा, प्रेम, आस्था की बात तो तब सार्थक लगती जब ये लोग मंदिर-मस्जिद को बचाने की होड़ में मनुष्य और मनुष्यता को क्षति नहीं पहुंचने देते. जिस मनुष्यता को जीवित रखने के लिए इन आस्था स्थलों की स्थापना की जाती रही है केवल उन्हीं को जिंदा रखने के लिए मनुष्यों का खून बहाया जा रहा है. चैराहे पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या अन्य श्रद्धा स्थलों की स्थापना कर दें और मनुष्य का मूल मनुष्यता को बचा पाने में सफल न रह पाए तो इन स्थलों की क्या उपयोगिता ? बिना मनुष्य और मनुष्यता के कौन इन स्थलों में जाने योग्य है ? क्या श्रद्धा, प्रेम, आस्था के बिना इन स्थलों के होने की सार्थकता है ? ये भाव केवल मनुष्य के भीतर ही पनप सकते हैं और इन भाव के होने से ही स्थलों की प्रमाणिकता सिद्ध होती है.

आवश्यकता है मनुष्यता को जीवित रखने की न कि केवल स्तूपों और ढाचों को बनाने की या खड़ा करने की. एक समय था जब संत-महात्माओं ने मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखने के लिए धर्म स्थलों (मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, जैन मंदिर आदि) का निर्माण करवाया था. यह सोचकर कि मनुष्य इन केंद्रों पर आकर केवल मनुष्यता को याद रखेंगे. आपस में प्रेम और श्रद्धा से रहेंगे.

क्या कोई यह बता सकता है कि क्यों आज मनुष्य से अधिक मकान महत्वपूर्ण हो गए हैं, क्यों ईश्वर को मनुष्य में जीवित न रखे जाने के बजाए इन ढांचों में स्थापित करने की ओर अधिक ध्यान दिया जा रहा है ? केवल भारत देश ही नहीं पूरा विश्व धर्म और जाति के नाम पर आपस में लड़-मर रहा है. नास्तिकों का तो यहां तक कहना है कि जिसे आस्तिक ईश्वर कहते हैं, वर्तमान में वह सृजन का नहीं संहार का कारण मात्र है. उनका मानना है कि अगर ऐसा नहीं है तो क्यों धर्म और ईश्वर के नाम पर देश और विश्व के लोग खून बहा रहे हैं ? यदि संतों, महापुरुषों ने ईश्वर को शांति और भाई-चारे की शक्ति के रूप में बताया है; ईश्वर को प्राप्त करने का मूल-मंत्र प्रेम बताया है; तो फिर क्यों ईश्वर को बदनाम कर नफरत को फैलाने का काम किया जा रहा है ?

भारत में भी समय-समय पर ईश्वर के खिलाफ कहने वाले को मौत के घाट उतारने का काम किया जाता रहा है, जबकि पड़ोसी देश  में ईश विरोधी कानून के तहत मासूम इंसानों को प्रताड़ित और दंडित किया जाता रहा है. क्या ईश्वर-विरोधी शब्द की कल्पना में जीने वाले लोग इंसान को मारकर ईश्वर की पूजा कर सकते हैं ?  कौन से ग्रंथ या ईश्वरीय किताब में लिखा गया है कि ईश्वर अलग-अलग होते हैं ? क्या किसी ने अभी तक ऐसा देखा है कि हिंदू का भगवान मुसलमान, सिख और क्रिसचन या अन्य धर्मों से अलग होता है ! या फिर भगवान ने कभी आकर यह कहा हो कि मैं अमुख धर्म के भगवान से बड़ा भगवान हूं ? ऐसा न तो होता है और न ही कभी हो सकता है. यदि पूरी मनुष्य जाति एक ही ईश्वर की पूजा एक ही नाम से करे तो क्या कुछ गलत हो जाएगा ! क्यों धर्म के नाम पर आडंबर रचने वाले लोग ईश्वर को अलग-अलग बताकर मनुष्य जाति को हिन्दू, मुसलिम, सिख, इसाई, जैन, यहूदी में विभाजित कर रहे हैं ?

केशिश तो यह की जानी चाहिए कि जो लोग मनुष्यता को भूल रहे हैं उन्हें पुनः मनुष्य बनाने के लिए एक अभियान चलाना चाहिए, जिसमें धर्म, जाति, देश से ऊपर उठकर केवल मनुष्य शब्द का विस्तार करा जाए. प्रत्येक मनुष्य ईश्वर की संतान है. यदि मनुष्य आपस में ही लड़ने-झगड़ते रहेंगे तो पिता रूपी ईश्वर को ही कष्ट पहुंचेगा. ईश्वर को कष्ट होगा तो मनुष्य कैसे सुखी रह सकता है ! भविष्य में कहीं यह न हो कि ईश्वर सोचने लगें कि उनके ही कारण बच्चे (मनुष्य) आपस में लड़ रहे हैं और वह स्वयं दुनिया से इस भाव को पूर्ण रूप से समाप्त कर दें !

यदि इंसान ईश्वर के अस्तित्व को बचाए रखना चाहता है तो आपस में प्रेम से रहना जरूरी है. महापुरुषों के अनुसार प्रेम है तो ईश्वर है. कई लोग ईश्वर को जरूरत पूरा करने वाला स्रोत समझते हैं. उन्हें उनकी जरूरतों की पूर्ति होती नहीं दिखती तो वह ईश्वर के न होने के प्रमाण देना शुरू कर देते हैं और स्वयं को नास्तिक बताते हैं. लेकिन उन लोगों को भी यह जानने की जरूरत है कि दुनिया में शांति और प्रेम का होना ही ईश्वर के होने की प्रमाणिकता है. जीवन यापन करने की जरूरत का पूरा होना कैसे ईश्वर की प्रमाणिकता न समझा जाए ! क्योंकि प्रेम भावना है और ईश्वर भी, जबकि दैनिक उपयोग की वस्तुएं भावहीन हैं.

किसी भी संत ने ईश्वर के दर्शन को बताने के पीछे यही तर्क दिया कि प्रेम को जानो. लेकिन आज तथाकथित कट्टरपंथी ईश्वर को नफरत और घृणा फैलाने का आधार बना रहें हैं. ईश्वर  के नाम पर स्थापित संगठन गोली, बारूद, बंदूकों के द्वारा दुनिया में कोहराम मचा रहे हैं. केवल आपसी प्रेम की भावना ईश्वर के अस्तित्व को बचाने में सक्षम है. रचना को पढ़ कर कई लोग यह भी कह सकते हैं कि ऐसे उपदेश बहुत सुने हैं, लेकिन यह उपदेश नहीं, एक सूचना है… इस बात की कि ईश्वर के अस्तित्व को बचा सको तो बचा लो.

- चारु लता कुमेड़ी

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3 Responses to "क्या ईश्वर ही नफरत का कारण हैं ?"

  1. santosh Jain says:

    Yehee satya hai. Maanav dharam hi sabse mahan dharam hai. Ishwar, Allah, Masjid, Mandir — ye sab to insaan ke apne aur apne swaarth or faayde ke kiye banaaye huye hain. Sab insaan to ek hi mitti ke putle hain. In-mein bhed-bhav dharam ke naam par pande-pujari-maula apne swaarth or pet ke liye banaate hain. Manusyamatra mein Bhagwaan hai; arey tu swayam Bhagwaan hai. Farak itna hi hai ki wo tir gaya ham bhatak gye or janam janam tak bhatkate rahege!

  2. mohan says:

    accha lika hai……………………….mandir mazid ..ber karate….. mel karate…. madusala……………………..

  3. jaikumar jha says:

    इश्वर कभी भी नफरत नहीं फैलाता….शर्मनाक स्तर के बेईमान और लोभी लोग जब सत्ता पे काबिज होते हैं तब देश और समाज को हर तरह से बाँटने के लिए ही बेईमानों और भ्रष्टाचारियों का इस्तेमाल कर ये कुकर्मी सत्ता पे काबिज लोग अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए नफरत फैलातें हैं….अब वक्त आ गया है जब हर धर्म और समुदाय के लोगों को एक होकर ऐसे लोगों को सरे आम जूते से पीटने का अभियान चलाना चाहिए …..

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